नवनियुक्त प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के नेतृत्व वाली कैबिनेट द्वारा अपने पहले ही दिन लिए गए फैसले ने नेपाल की राजनीति में घमासान शुरू कर दिया है। सरकार ने गौरी बहादुर कार्की के नेतृत्व वाले जांच आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का आदेश दिया है, जिसका नेकपा एमाले से जुड़े 23 जनसंगठनों ने कड़ा विरोध किया है। इन संगठनों ने इसे न्याय की आड़ में राजनीतिक बदला लेने की कोशिश बताया है और सरकार को स्पष्ट चुनौती दी है कि यदि यह निर्णय वापस नहीं लिया गया, तो वे सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होंगे।

एमाले के भ्रातृ संगठनों ने एक संयुक्त बयान जारी कर कार्की आयोग की रिपोर्ट को 'पूर्वाग्रह से ग्रसित' और 'निंदनीय' बताया है। उनका आरोप है कि यह रिपोर्ट विपक्षी नेताओं के चरित्र हनन और घृणा की राजनीति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से तैयार की गई है। बयान में कहा गया है कि सितंबर माह में हुए प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा और लूटपाट की निष्पक्ष जांच किए बिना ही एकतरफा निष्कर्ष निकाले गए हैं। संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने विपक्षी नेताओं के खिलाफ दमनकारी कदम उठाए, तो देश में अस्थिरता पैदा होगी जिसकी पूरी जिम्मेदारी वर्तमान सरकार की होगी।

ADVERTISEMENT Nepal Aaja Register

चेतावनी देने वाले प्रमुख नेताओं में राष्ट्रीय युवा संघ के अध्यक्ष महाराज गुरुंग, प्रेस चौतारी के गणेश पांडे और अनेरास्ववियु के दीपक धामी शामिल हैं। इन संगठनों ने मांग की है कि कथित रूप से पक्षपाती कार्की आयोग को तुरंत भंग किया जाए और कैबिनेट के आज के फैसले को निरस्त किया जाए। सरकार के गठन के पहले ही दिन प्रमुख विपक्षी दल के जमीनी संगठनों का यह आक्रामक रुख आने वाले समय में एक बड़े राजनीतिक टकराव की ओर इशारा कर रहा है।

May be an image of textMay be an image of the Western Wall and text