बांग्लादेश में हाल के महीनों में हुई भीड़ हिंसा की घटनाओं को लेकर नई जांच रिपोर्टों ने एक अलग आयाम सामने रखा है—विदेश में सक्रिय डिजिटल अभियानकर्ताओं द्वारा फैलाए गए ऑनलाइन उकसावे को संभावित कारक के रूप में चिन्हित किया गया है। इससे डिजिटल सामग्री और ज़मीनी हिंसा के बीच संबंध पर गंभीर बहस शुरू हुई है।

क्षेत्रीय जांच आधारित रिपोर्टों, विशेष रूप से Northeast News की कवरेज के अनुसार, सोशल मीडिया पर प्रसारित भ्रामक सूचनाएँ, भड़काऊ टिप्पणियाँ और तात्कालिक कार्रवाई के आह्वान ने संवेदनशील मुद्दों को और विस्फोटक बनाया। धार्मिक और राजनीतिक विषयों से जुड़े पोस्टों ने कई मामलों में स्थानीय तनाव को तेज करने का काम किया।

रिपोर्टों में कहा गया है कि फेसबुक, यूट्यूब और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर प्रसारित सामग्री में कई बार घटनाओं को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया। इन संदेशों को आगे बढ़ाने वाले अनेक अकाउंट देश के बाहर से संचालित बताए गए हैं, जिन्हें प्रवासी डिजिटल नेटवर्क से जोड़ा गया है।

Northeast News की जांच के मुताबिक, कुछ ऑनलाइन समूह स्थानीय घटनाओं को अधिक उग्र रूप में पेश कर समर्थकों को तत्काल प्रतिक्रिया देने के लिए प्रेरित करते हैं। ऐसी डिजिटल मुहिमों के बाद नागरिकों, अल्पसंख्यक समुदायों और सार्वजनिक संपत्ति पर हमलों के उदाहरण भी रिपोर्ट में दर्ज किए गए हैं।

सुरक्षा और संचार विशेषज्ञों का कहना है कि सीमा-पार डिजिटल उकसावा केवल एक देश की समस्या नहीं रह गया है। कमजोर डिजिटल निगरानी, धीमी तथ्य-जांच प्रणाली और बढ़ती राजनीतिक ध्रुवीकरण इस खतरे को क्षेत्रीय स्तर पर बढ़ा सकते हैं।

मानवाधिकार समूहों ने सरकार और सोशल मीडिया कंपनियों दोनों से समन्वित कार्रवाई की मांग की है, ताकि हिंसा भड़काने वाली सामग्री पर रोक लगे और जिम्मेदार लोगों की पहचान हो सके। साथ ही, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया जा रहा है।