बांग्लादेश इस समय एक निर्णायक राजनीतिक दौर से गुजर रहा है, जहां लंबे समय तक हाशिये पर रही इस्लामी विचारधाराएं चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से फिर से मुख्यधारा में प्रवेश कर रही हैं। इस बदलाव ने देश की धर्मनिरपेक्ष पहचान और अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
विश्लेषकों के अनुसार पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बने राजनीतिक शून्य ने जमात-ए-इस्लामी से जुड़ी ताकतों को फिर से उभरने का अवसर दिया। युवाओं का एक वर्ग धार्मिक दलों की ओर झुकता दिख रहा है, जिससे पारंपरिक धर्मनिरपेक्ष दल कमजोर पड़ रहे हैं।
जमात समर्थक नेताओं द्वारा महिलाओं के नेतृत्व को अस्वीकार करने वाले बयानों ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। धार्मिक और “जैविक” तर्कों के आधार पर दिए गए ऐसे बयान संविधान में निहित लैंगिक समानता के मूल्यों को चुनौती देते हैं, जिस पर मानवाधिकार संगठनों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है।
चुनावी माहौल भी तनावपूर्ण होता जा रहा है। कई क्षेत्रों में उम्मीदवारों और सुरक्षा कर्मियों पर हुए हमलों ने निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। खासकर हिंदू, बौद्ध और ईसाई समुदायों के बहुल क्षेत्रों में सुरक्षा चिंताएं बढ़ी हैं।
अल्पसंख्यक नेताओं ने धार्मिक हमलों, धमकियों और सामाजिक बहिष्कार की घटनाओं में वृद्धि का आरोप लगाया है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने चुनावी अवधि में विशेष सुरक्षा उपायों की मांग की है।
पश्चिमी कूटनीतिक हलकों में भी बांग्लादेश को लेकर नीति पर बहस तेज है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि लोकतांत्रिक संवाद के नाम पर इस्लामी दलों से बढ़ती नजदीकी, अफगानिस्तान के बाद की रणनीतिक गलतियों जैसी स्थिति पैदा कर सकती है।
विश्लेषकों का कहना है कि यदि जमात-प्रेरित राजनीतिक इस्लाम चुनावों के माध्यम से स्थायी प्रभाव बना लेता है, तो बांग्लादेश पाकिस्तान जैसे धार्मिक–राजनीतिक ढांचे की ओर बढ़ सकता है, जिसका असर पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता पर पड़ सकता है।
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