लंबे समय से मजबूत बताए जाने वाले चीन–पाकिस्तान संबंध अब गंभीर दबाव में दिखाई दे रहे हैं। पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता इस स्तर तक पहुंच चुकी है कि चीन जैसी बड़ी शक्ति के लिए भी हालात को संतुलित रखना मुश्किल होता जा रहा है।
पाकिस्तान की सुरक्षा स्थिति इस तनाव का मुख्य कारण बन रही है। इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रांत (ISKP) और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) जैसे समूहों ने चीनी हितों को सीधे निशाना बनाना शुरू कर दिया है। चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) से जुड़ी परियोजनाएँ बार-बार हमलों और धमकियों का सामना कर रही हैं, जिससे बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का सबसे संवेदनशील हिस्सा खतरे में है।
बलूचिस्तान में सशस्त्र विद्रोह के तेज होने से चीनी परियोजनाएँ स्थानीय असंतोष का केंद्र बनती जा रही हैं। रेल विस्फोट, सुरक्षा ठिकानों पर हमले और जबरन गायब किए जाने की घटनाएँ बढ़ने के साथ, बलूच समूह चीन को पाकिस्तानी सैन्य ढांचे का समर्थक बताकर अपने हमलों को वैचारिक आधार दे रहे हैं।
इस बीच चीन की अपनी आर्थिक चुनौतियाँ भी उसकी भूमिका को सीमित कर रही हैं। संपत्ति क्षेत्र में संकट, घरेलू कर्ज और आर्थिक मंदी के दबाव के कारण पाकिस्तान को पहले जैसी वित्तीय सहायता देना अब बीजिंग के लिए कठिन होता जा रहा है।
रणनीतिक स्तर पर चीन की नीति में बदलाव साफ दिखता है। आर्थिक निवेश के बजाय अब सुरक्षा प्राथमिकता बन चुकी है। चीनी नागरिकों और परियोजनाओं की रक्षा के लिए निजी सुरक्षा और सैन्य समन्वय बढ़ाया गया है, जो पाकिस्तान को साझेदार से अधिक जोखिमपूर्ण क्षेत्र के रूप में देखने का संकेत देता है।
विश्लेषकों के अनुसार, यह रिश्ता अब बराबरी की साझेदारी न रहकर असमान निर्भरता में बदल रहा है। पाकिस्तान चीन पर अधिक निर्भर होता जा रहा है, जबकि चीन उसे एक अस्थिर लेकिन रणनीतिक रूप से उपयोगी देश के रूप में देख रहा है।
इन परिस्थितियों में चीन–पाकिस्तान धुरी की दीर्घकालिक स्थिरता पर सवाल उठ रहे हैं। बढ़ते आतंकवाद, जातीय संघर्ष और संस्थागत कमजोरियों के बीच केवल बाहरी समर्थन से स्थिरता संभव नहीं दिखती।
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