काठमांडू — तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर चीन द्वारा बनाई जा रही विशाल जलविद्युत परियोजना को लेकर हिमालयी क्षेत्र की पर्यावरणीय और भू-राजनीतिक सुरक्षा पर नई चिंताएं व्यक्त की गई हैं।
भारतीय रणनीतिक विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी ने अपने नवीनतम विश्लेषण में चीन की इस परियोजना को ‘अपस्ट्रीम वॉटर बम’ की संज्ञा देते हुए कहा है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इसके संभावित जोखिमों पर गंभीर ध्यान देना चाहिए।
चीन द्वारा निर्मित की जा रही यह परियोजना दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना बनने की राह पर है। यह तिब्बत की यारलुंग त्सांगपो नदी पर स्थित है, जिसे भारत में प्रवेश करने के बाद ब्रह्मपुत्र के नाम से जाना जाता है। परियोजना का स्थान भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र से लगे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में पड़ता है।
चेलानी के अनुसार, परियोजना क्षेत्र भूकंपीय जोखिम वाले क्षेत्र में आता है। उन्होंने उल्लेख किया कि चीनी वैज्ञानिकों ने भी परियोजना क्षेत्र में कमजोर भूगर्भीय संरचनाओं तथा भूकंप या भ्रंश (फॉल्ट) गतिविधियों से होने वाले सम्भावित जोखिमों पर चिंता व्यक्त की है। विशाल जलाशय के कारण उत्पन्न होने वाले अतिरिक्त भूगर्भीय दबाव को भी जोखिम के एक पहलू के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
भारत और बांग्लादेश में प्रभाव की चिंता
यारलुंग त्सांगपो तिब्बत से दक्षिण की ओर बहते हुए भारत के अरुणाचल प्रदेश और असम से होकर बांग्लादेश पहुँचती है। इस नदी पर चीन द्वारा बनाई जा रही विशाल परियोजना से नदी के प्रवाह, जल के मौसमी वितरण, गाद (सिल्ट) और नदी के पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर भारत और बांग्लादेश में पहले से ही चिंता बनी हुई है।
चेलानी ने संकेत दिया है कि परियोजना में किसी दुर्घटना, भूकंप या अचानक पानी छोड़ने की स्थिति उत्पन्न होने पर उसका प्रभाव चीन की सीमाओं से काफी दूर तक पहुँच सकता है। उनके अनुसार, हिमालयी नदी प्रणाली भारत और बांग्लादेश के करोड़ों लोगों के जीवन, कृषि और जल सुरक्षा से सीधे जुड़ी हुई है।
नेपाल का संदर्भ क्यों महत्वपूर्ण है?
यद्यपि नेपाल इस परियोजना के प्रत्यक्ष निचले बहाव वाले मुख्य देशों में शामिल नहीं है, लेकिन हालिया हिमालयी आपदाओं ने यह दिखाया है कि तिब्बत-नेपाल सीमा क्षेत्र में होने वाली भूगर्भीय और जल-संबंधी घटनाओं का सीमा पार प्रभाव कितना तीव्र हो सकता है।
26 अगस्त के हिमस्खलन और हिमनद आपदा के बाद नेपाल और तिब्बत दोनों ओर भारी नुकसान हुआ है। चीन की ओर आपदा प्रभावित क्षेत्र में अभी भी राहत एवं पुनर्वास कार्य जारी है।
28 अगस्त को चीन-नेपाल सीमा के पास बनी एक बड़ी 'बैरियर लेक' (अस्थायी झील) फटने से नेपाल की ओर अतिरिक्त बाढ़ का खतरा पैदा हो गया था। नेपाली अधिकारियों ने बताया था कि उससे पहले चीनी अधिकारियों ने नेपाल को झील फटने के खतरे के बारे में चेतावनी दी थी।
इस घटना ने हिमालय में बन रहे बड़े बुनियादी ढांचों, ग्लेशियरों, नदी प्रणालियों और आपदा पूर्व चेतावनी प्रणालियों के बीच के संबंध को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।
पारदर्शिता और सूचना आदान-प्रदान का सवाल
चेलानी ने आरोप लगाया है कि चीन ने यारलुंग त्सांगपो परियोजना से संबंधित तकनीकी और पर्यावरणीय जानकारी पर्याप्त रूप से सार्वजनिक नहीं की है। उन्होंने भारत और बांग्लादेश के साथ नियमित जल प्रवाह आंकड़ों के आदान-प्रदान और आपातकालीन आपदाओं के लिए पूर्व चेतावनी तंत्र स्थापित करने की मांग की है।
हालाँकि, यह निष्कर्ष कि यह 'सुपर डैम' निश्चित रूप से विनाशकारी बाढ़ लाएगा, कोई स्थापित वैज्ञानिक तथ्य नहीं है। चेलानी का लेख मूल रूप से सम्भावित भूकंपीय, पर्यावरणीय और सीमा पार जल सुरक्षा जोखिमों पर आधारित एक रणनीतिक विश्लेषण है।
हिमालय में जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों का पिघलना और तीव्र बुनियादी ढांचा निर्माण एक साथ आगे बढ़ रहे हैं, ऐसे में इन बड़ी परियोजनाओं का जोखिम मूल्यांकन, पारदर्शिता और सीमा पार सूचनाओं का आदान-प्रदान अब क्षेत्रीय सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है।