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10 Feb, 2026, Tuesday
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2012 सीमा चराई समझौते के बावजूद नेपाली पशुपालकों से चीनी सुरक्षा बलों की मारपीट का आरोप

Staff Reporter
Staff Reporter | 2026 February 09, 11:50 AM
सारांश AI
• 2012 सीमा चराई समझौते के बावजूद नेपाली पशुपालकों से चीनी सुरक्षा बलों द्वारा मारपीट और दुर्व्यवहार के आरोप सामने आए हैं।
• सीमा पार चराई के दौरान टेंट और सामान जलाने तथा चरवाहों को खदेड़ने की घटनाएँ रिपोर्ट में दर्ज हैं।
• विशेषज्ञों ने इसे सीमावर्ती आजीविका और कूटनीतिक समन्वय की चुनौती से जुड़ा मामला बताया है।

पश्चिमी नेपाल के पर्वतीय सीमावर्ती इलाकों में दशकों से जारी मौसमी सीमा-पार चराई व्यवस्था अब विवाद और असुरक्षा के घेरे में आ गई है। कई नेपाली पशुपालकों ने आरोप लगाया है कि 2012 के द्विपक्षीय चराई समझौते के बावजूद चीनी सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें रोका, मारा-पीटा और उनके अस्थायी डेरों व सामान को जला दिया।

TibetanReview.net ने काठमांडू पोस्ट (3 फरवरी) की रिपोर्ट के हवाले से लिखा है कि बाजहांग जिले और आसपास के चरवाहों को हाल के वर्षों में तिब्बती क्षेत्र में प्रवेश पर कड़ी रोक और दबाव का सामना करना पड़ रहा है। 2012 के नेपाल-चीन सीमा चराई समझौते के तहत सीमा निवासियों को 30 किलोमीटर तक चराई की अनुमति है।

सैपाल क्षेत्र के बिर बहादुर बोहरा और पासांग तामांग ने बताया कि वे सीमा स्तंभ नंबर 2 के पास लगभग 17 किलोमीटर अंदर घोड़े और खच्चर चरा रहे थे, तभी चीनी सुरक्षा टीम पहुंची। उनके अनुसार टेंट, बिस्तर, खाद्य सामग्री, कपड़े, बर्तन और घोड़े का सामान जला दिया गया। तामांग ने कहा कि उनका मोबाइल छीनकर उसी से सिर पर मारा गया और फोन टूट गया। बाद में उन्हें सीमा की ओर वापस भेजते हुए दोबारा न आने की चेतावनी दी गई।

अगले दिन जिमा के 68 वर्षीय चरवाहे सब्बल्या राउत के साथ भी दुर्व्यवहार की कोशिश की गई। वे 550 से अधिक भेड़ें चरा रहे थे। उन्होंने कहा कि दया की अपील करने के बाद वे वहां से हटे। अनुवाद करने वालों के कारण स्थिति शांत हुई, लेकिन उन्हें रुकने नहीं दिया गया।

स्थानीय लोगों ने बताया कि ऐसे मामले पहले भी हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, तीन वर्ष पहले सम्नेल गुरूंग और अन्य 11 चरवाहों को बिना अनुमति प्रवेश के आरोप में पीटा गया था। पारंपरिक चराई क्षेत्र अब व्यावहारिक रूप से बंद हो गए हैं।

चरवाहों का कहना है कि पिछले सात–आठ वर्षों में चीनी पक्ष ने वन क्षति का हवाला देते हुए नियंत्रण कड़ा किया है। कोविड से पहले हर गर्मी में हजारों पशु तिब्बती चरागाहों में जाते थे और सीमापार व्यापार व सामाजिक संबंध सक्रिय थे, जो अब लगभग समाप्त हो चुके हैं।

पूर्व नेपाली राजदूत राजेश्वर आचार्य ने कहा कि नेपाल ने स्थानीय समुदायों के मुद्दों को कूटनीतिक स्तर पर प्रभावी ढंग से नहीं उठाया।

दूसरी ओर, MyRepublica (6 फरवरी) के अनुसार, काठमांडू में चल रहे एक 10-दिवसीय बौद्ध धार्मिक कार्यक्रम में आए क्याब्जे जोनांग ग्यात्साब रिनपोछे की यात्रा पर राजनीतिक बहस शुरू हुई है। नेकपा एमाले के उपाध्यक्ष राम बहादुर थापा ने राज्यस्तरीय स्वागत का दावा किया, लेकिन गृह मंत्रालय और पुलिस प्रवक्ताओं ने ऐसी किसी जानकारी से इनकार किया।

डोल्पो सोसाइटी के अध्यक्ष ताशी फुन्छो गुरूंग ने कहा कि यह निमंत्रण ऐतिहासिक और धार्मिक परंपरा से जुड़ा है।

सीमावर्ती आजीविका और कूटनीतिक संवेदनशीलता से जुड़े ये मुद्दे आगे भी नीति और निगरानी के केंद्र में बने रहने के संकेत दे रहे हैं।

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