पाकिस्तान की जर्जर होती अर्थव्यवस्था के बीच एक बड़ा और विनाशकारी झटका लगा है। रिपोर्टों के अनुसार, जनवरी 2026 तक 125 विदेशी कंपनियों ने देश से अपना निवेश वापस लेते हुए अपना संचालन पूरी तरह से बंद कर दिया है। इस व्यापक कॉर्पोरेट पलायन ने राष्ट्र के औद्योगिक उत्पादन, कर राजस्व और रोजगार बाजार के सामने एक गहरा और तात्कालिक संकट खड़ा कर दिया है।

वित्तीय, औद्योगिक, सेवा और उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्रों से जुड़ी इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बाहर जाने का मुख्य कारण एक बेहद प्रतिकूल व्यापारिक माहौल बताया गया है। आर्थिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि विदेशी मुद्रा भंडार की भारी कमी, ऊर्जा संकट, विनिमय दरों में अस्थिरता और कड़े आयात प्रतिबंधों ने इन कंपनियों के लिए अपने दैनिक कार्यों को जारी रखना असंभव बना दिया था। इसके अतिरिक्त, सुरक्षा जोखिमों और नीतिगत अनिश्चितताओं ने निवेश के माहौल को और अधिक खराब कर दिया।

यह बड़े पैमाने पर पूंजी पलायन इस्लामाबाद की व्यापक आर्थिक कमजोरियों को उजागर करता है। यद्यपि पाकिस्तानी सरकार संरचनात्मक सुधारों, कर प्रणाली में बदलाव और निजीकरण के माध्यम से हालात को स्थिर करने का लगातार दावा कर रही है, लेकिन आसमान छूती महंगाई, बढ़ते कर्ज और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) पर अत्यधिक निर्भरता के कारण विदेशी निवेशकों का भरोसा पूरी तरह से टूट चुका है। जमीनी स्तर पर सुधारों की कमी ने इस अविश्वास को और गहरा किया है।

इस कॉर्पोरेट वापसी का प्रभाव पाकिस्तान की सीमाओं से परे पूरे दक्षिण एशिया के आर्थिक परिदृश्य को बदल रहा है। एक तरफ जहां पड़ोसी देश भारत डिजिटल और विनिर्माण क्षेत्र में तेजी से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) आकर्षित कर रहा है, वहीं पाकिस्तान की यह अस्थिरता क्षेत्रीय व्यापार संतुलन को बिगाड़ रही है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस स्थिति से क्षेत्रीय आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हो सकती हैं, जिसका अप्रत्यक्ष असर नेपाल जैसी छोटी अर्थव्यवस्थाओं और सार्क (SAARC) जैसे संगठनों की प्रभावशीलता पर पड़ना तय है।

यदि पाकिस्तान सरकार द्वारा घोषित नीतिगत सुधारों को जल्द और प्रभावी ढंग से जमीन पर लागू नहीं किया गया, तो विदेशी पूंजी आकर्षित करने की उसकी क्षमता लंबे समय के लिए पंगु हो जाएगी, जिससे यह घरेलू संकट एक स्थायी क्षेत्रीय चुनौती में तब्दील हो जाएगा।