भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ नया मुक्त व्यापार समझौता अब केवल आर्थिक करार के रूप में नहीं देखा जा रहा है। विश्लेषकों के अनुसार यह समझौता यूरेशिया की भू-राजनीतिक दिशा को प्रभावित करने वाला एक रणनीतिक कदम बन चुका है।

लगभग 27 ट्रिलियन डॉलर के संयुक्त बाजार को कवर करने वाला यह समझौता यूरोपीय निर्यातकों के लिए सालाना करीब 4 अरब यूरो की सीमा शुल्क राहत ला सकता है। वहीं भारत के लिए यह उच्च तकनीक, पूंजी और वैश्विक बाजारों तक तेज़ पहुंच का मार्ग खोलता है।

इस समझौते की पृष्ठभूमि में अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध, पुराने टैरिफ विवाद और चीन पर यूरोप की बढ़ती निर्भरता को लेकर असहजता अहम कारक रहे हैं। इन्हीं परिस्थितियों में भारत को एक व्यवहारिक और स्थिर विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है।

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भारत इस समझौते के माध्यम से स्वयं को केवल उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऊर्जा, डिजिटल तकनीक, रक्षा, एयरोस्पेस और नवीकरणीय क्षेत्रों में सहयोग से औद्योगिक क्षमता में दीर्घकालिक बदलाव की उम्मीद है।

यूरोप के लिए यह समझौता रूस से कमजोर होते संबंधों और चीन पर आर्थिक निर्भरता के जोखिम के बीच एक रणनीतिक पुनर्संतुलन का संकेत देता है।

भूराजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्यापार समझौता चीन-केंद्रित उत्पादन ढांचे को चुनौती देते हुए भारत की रणनीतिक भूमिका को वैश्विक स्तर पर मजबूत कर सकता है।