पाकिस्तान द्वारा हर वर्ष मनाए जाने वाले “कश्मीर एकता दिवस” पर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए सवाल उठ रहे हैं। पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर (PoJK) से जुड़े मानवाधिकार कार्यकर्ता और प्रवासी आवाजें कह रही हैं कि यह आयोजन प्रतीकात्मक समर्थन से अधिक, स्थानीय अधिकार और प्रशासनिक समस्याओं से ध्यान हटाने का माध्यम बन गया है।

ANI News और Global Strat View में प्रकाशित विश्लेषणात्मक रिपोर्टों के अनुसार, PoJK से जुड़े कई सामाजिक और अधिकार समूहों ने राजनीतिक दबाव, अभिव्यक्ति की सीमाएँ, आर्थिक उपेक्षा और जबरन गुमशुदगी जैसे मुद्दों को प्रमुख चिंता के रूप में उठाया है। उनका आरोप है कि इन प्रश्नों पर ठोस जवाब देने के बजाय आधिकारिक कार्यक्रम बाहरी राजनीतिक संदेश पर केंद्रित रहते हैं।

रिपोर्टों में PoJK के प्रशासनिक ढांचे को लेकर भी सवाल दर्ज किए गए हैं, जिनमें स्थानीय स्वशासन की सीमित प्रभावशीलता, चुनावी वातावरण पर संदेह, और बुनियादी सेवाओं की कमी जैसे बिंदु शामिल हैं। ऊर्जा संकट, बेरोजगारी और विकास ढांचे की कमजोरी को स्थानीय असंतोष बढ़ाने वाले कारक के रूप में बताया गया है।

विश्लेषणों में उद्धृत PoJK मूल के अधिकार समर्थकों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि क्षेत्र की स्थिति को केवल द्विपक्षीय विवाद के नजरिए से नहीं, बल्कि वहाँ के नागरिकों के अधिकारों के आधार पर भी परखा जाए। उनका कहना है कि वास्तविक एकजुटता का अर्थ स्थानीय लोगों के नागरिक और लोकतांत्रिक अधिकारों की गारंटी से होना चाहिए।

क्षेत्रीय मामलों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का आकलन है कि जैसे-जैसे आंतरिक स्थितियों पर आधारित रिपोर्टें सामने आ रही हैं, कश्मीर पर अंतरराष्ट्रीय विमर्श अधिक बहु-आयामी होता जा रहा है। आगे की बहस में प्रतीकात्मक राजनीति के साथ-साथ प्रशासनिक जवाबदेही भी केंद्र में रहने की संभावना जताई गई है।