नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को अपने सबसे सुरक्षित राजनीतिक गढ़, झापा-5 में एक अभूतपूर्व और गंभीर राजनीतिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। 8 और 9 सितंबर को हुए 'जेन-जी' (Gen-Z) आंदोलन के बाद, इस क्षेत्र का सियासी माहौल पूरी तरह बदल चुका है। हालिया फील्ड रिपोर्ट्स और सार्वजनिक वीडियो गवाहियों से यह साफ हो गया है कि स्थानीय मतदाता अब खुलेआम उनसे अपना समर्थन वापस ले रहे हैं। लोग स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि वे अब ओली को वोट नहीं देंगे और उनके राजनीतिक संन्यास की मांग कर रहे हैं।
इस भारी जन-आक्रोश की जड़ में दशकों से किए गए अधूरे वादे और विकास का असंतुलित मॉडल है। स्थानीय नागरिक इस बात से बेहद नाराज हैं कि स्वास्थ्य देखभाल, रोजगार और बुनियादी ढांचे जैसी वास्तविक जरूरतों को नजरअंदाज करके 'भ्यू टावर' और औद्योगिक क्षेत्रों जैसी विवादित और गैर-उत्पादक परियोजनाओं पर करोड़ों खर्च किए गए। पारदर्शिता की कमी और विकास के नाम पर हो रहे इस अनुचित खर्च ने नेतृत्व के प्रति जनता के विश्वास को पूरी तरह से तोड़ दिया है।
विकास के मुद्दों के साथ-साथ, ओली की कार्यशैली ने भी मतदाताओं को निराश किया है। उनके कठोर भाषण, आलोचकों के प्रति असहिष्णुता और अत्यधिक आत्मविश्वास से भरे रवैये ने स्थानीय लोगों को थका दिया है। विशेष रूप से, 'जेन-जी' आंदोलन के दौरान उनकी प्रतिक्रिया ने युवाओं को और अधिक भड़का दिया। महंगाई, बेरोजगारी और युवाओं के भारी पलायन जैसी वास्तविक समस्याओं के बीच, नेतृत्व का यह रवैया आग में घी का काम कर रहा है।
इसके अलावा, अतीत के घोटालों ने भी फिर से तूल पकड़ लिया है। स्वास्थ्य उपकरणों की खरीद में हुए भ्रष्टाचार और विवादित राजनीतिक नियुक्तियों जैसे पुराने मामलों ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वर्तमान नेतृत्व में नैतिक क्षमता का भारी अभाव है। जवाबदेही और कानून के शासन को लेकर अब मतदाता कोई भी समझौता करने के मूड में नहीं हैं।
झापा-5 में उठा यह राजनीतिक तूफान केवल एक नेता के खिलाफ विद्रोह नहीं है, बल्कि यह सत्ता के हस्तांतरण और पीढ़ियों के बदलाव की एक मजबूत मांग है। युवा अब एक ऐसी नई नेतृत्व संरचना की मांग कर रहे हैं जो जवाबदेह हो। यह स्थानीय बगावत इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पारंपरिक राजनीतिक समीकरण अब खत्म हो रहे हैं, और आने वाले समय में देश की राजनीति का भविष्य इन्हीं नई आकांक्षाओं के आधार पर तय होगा।