नेपाल एक बार फिर ऐसे राजनीतिक दौर में पहुंच गया है जहां चुनावों से अधिक चर्चा उनकी विश्वसनीयता और परिणामों को लेकर हो रही है। आसन्न मतदान के बीच विश्लेषक पूछ रहे हैं कि क्या यह प्रक्रिया लंबे समय से चले आ रहे संकट का समाधान कर पाएगी।
मौजूदा हालात की तुलना 1980 के जनमतसंग्रह से की जा रही है। उस समय छात्र आंदोलनों और बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच सत्ता ने जनमतसंग्रह का सहारा लिया, लेकिन विवादित नतीजों ने बहुदलीय लोकतंत्र को दस साल तक टाल दिया।
काठमांडू में हुए प्रदर्शनों और राज्य संस्थानों पर हमलों को इतिहासकार उस दौर की निर्णायक घटनाओं के रूप में देखते हैं। आकार में सीमित होने के बावजूद, उन्होंने नेपाल की राजनीतिक दिशा को गहराई से प्रभावित किया।
आज का आंदोलन भी मुख्यतः युवाओं से जुड़ा है, जो इस बार सोशल मीडिया प्रतिबंधों के खिलाफ खड़ा हुआ है। विश्लेषकों के अनुसार, संकट के समय लिए गए त्वरित राजनीतिक फैसले और पीढ़ीगत असंतोष के बीच टकराव फिर सामने आया है।
अब नजरें 5 मार्च को प्रस्तावित चुनावों पर हैं। हालांकि प्रचार जारी है, लेकिन निष्पक्षता को लेकर संदेह बना हुआ है। नेकपा एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली ने चुनावों के उद्देश्य पर सवाल उठाते हुए परिणाम स्वीकार न करने की चेतावनी दी है।
राजनीतिक विश्लेषक तीन संभावनाएं देखते हैं—चुनाव टलने से अस्थिरता बढ़ना, पुराने गठबंधन-आधारित राजनीति की पुनरावृत्ति, या फिर घोषणाओं में दिखाया गया सुधार का वादा। अंतिम विकल्प पर भरोसा करने वाले भी स्वीकार करते हैं कि मौजूदा संवैधानिक ढांचे में यह स्पष्ट नहीं है।
इतिहास यही संकेत देता है कि केवल चुनाव पर्याप्त नहीं होते। नेपाल एक बार फिर उसी प्रतीक्षा में खड़ा है—जहां भविष्य की दिशा अनिश्चित बनी हुई है।
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