काठमांडू — पड़ोसियों के खिलाफ उग्रवादी समूहों को रणनीतिक हथियार बनाने की नीति के कारण पाकिस्तान एक बार फिर गंभीर अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना कर रहा है। अफगानिस्तान द्वारा अपनी सीमा में हुए घुसपैठ के पीछे पाकिस्तानी सैन्य तंत्र का हाथ होने का दावा किए जाने के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा संकट गहरा गया है।

अफगान रक्षा मंत्रालय के अनुसार, नुरिस्तान प्रांत में चलाए गए एक सैन्य अभियान में ४१ आतंकियों को ढेर कर दिया गया, जबकि ६२ अन्य को गिरफ्तार किया गया। काबुल का स्पष्ट आरोप है कि आईएसआईएस से जुड़े इन आतंकियों को पाकिस्तानी सरजमीं पर भर्ती, प्रशिक्षण और हथियार मुहैया कराकर सीमा पार भेजा गया था।

यह घटनाक्रम भारत और ईरान द्वारा दशकों से उठाए जा रहे उन मुद्दों की पुष्टि करता है, जिनमें पाकिस्तान पर अपनी भूमि से आतंकवाद को प्रायोजित करने का आरोप लगाया जाता रहा है। भारत ने २००८ के मुंबई हमलों सहित विभिन्न आतंकी घटनाओं में लश्कर-ए-तैयाबा और जैश-ए-मोहम्मद को मिले पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के समर्थन के ठोस प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। वहीं, ईरान ने भी जैश अल-अदल द्वारा किए जाने वाले हमलों पर इस्लामाबाद को सख्त चेतावनी दी है।

अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसियों और यूरोपीय संघ की रिपोर्टों से यह स्पष्ट हुआ है कि पाकिस्तान आधारित इन नेटवर्कों का खतरा केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं है। ब्रिटेन और यूरोपीय सुरक्षा संस्थानों के अनुसार, पश्चिमी देशों में हुए कई आतंकी हमलों के तार दक्षिण वजीरिस्तान में प्रशिक्षित कैडरों से जुड़े पाए गए हैं।

दूसरे देशों में अस्थिरता फैलाने के लिए तैयार किया गया यह आतंकी ढांचा अब खुद पाकिस्तान के लिए रणनीतिक और कूटनीतिक संकट बन चुका है। एफएटीएफ की ग्रे सूची जैसी अंतरराष्ट्रीय कार्रवाइयों के बावजूद, आतंकवाद को राज्य नीति के रूप में इस्तेमाल करने की यह प्रवृत्ति वैश्विक शांति के लिए निरंतर खतरा बनी हुई है।

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