एस.बी. शाह - छठ पर्व के समापन के साथ ही नेपाली राजनीति एक बार फिर भीषण सड़क आंदोलन, संभावित ध्रुवीकरण और शक्ति-संतुलन के नए मोड़ पर प्रवेश करने के स्पष्ट संकेत दे रही है। पारंपरिक वामपंथी शक्तियों, नेपाली कांग्रेस के भीतर असंतुष्ट संस्थापन पक्ष और नई राजनीतिक शक्तियों के बीच शुरू हुए अदृश्य राजनीतिक जोड़-घटाव ने आगामी राजनीतिक दिशा को और अधिक जटिल बना दिया है। इस राजनीतिक घटनाक्रम के केंद्र में नेकपा (एमाले), पुष्पकमल दाहाल 'प्रचंड' के नेतृत्व वाले कम्युनिस्ट घटक और शेर बहादुर देउवा पक्ष की नेपाली कांग्रेस के बीच बनने वाला संभावित मोर्चा, गगन थापा का वैचारिक रुख, तथा राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) के भीतर ही सभापति रवि लामिछाने और उसी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के बीच की आंतरिक और रणनीतिक खींचतान शामिल है।
नेपाली राजनीति में त्योहारों के बाद का आंदोलन केवल विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि सत्ता-समीकरण बदलने का पारंपरिक हथियार रहा है। जनाधार खिसकने की स्थिति में नेकपा (एमाले) और प्रचंड नीत कम्युनिस्ट पक्ष एक बार फिर सड़क आंदोलन के जरिए अपनी संगठनात्मक शक्ति का प्रदर्शन करने और वर्तमान सरकार को रक्षात्मक स्थिति में लाने के लिए एकजुट हो रहे हैं। प्रचंड के लिए आंदोलन हमेशा संसदीय राजनीति में अपनी सौदेबाजी की क्षमता (बारगेनिंग पावर) बढ़ाने का मुख्य जरिया रहा है। इस समीकरण का सबसे दिलचस्प पहलू शेर बहादुर देउवा पक्ष की संभावित भागीदारी है। यद्यपि गगन थापा ने नेपाली कांग्रेस का नेतृत्व हथिया लिया है और कुछ लोगों का मानना है कि थापा के उकसावे पर ही जेन जी आंदोलन के दौरान देउवा पर शारीरिक हमला किया गया व उनके घर को लूटा गया, इसके बावजूद देउवा राजनीति में उतने ही सक्रिय और प्रभावशाली हैं। पार्टी में थापा के हावी होने और हमले के बाद रक्षात्मक बना देउवा गुट अपने राजनीतिक वजूद और प्रभाव को बनाए रखने के लिए कम्युनिस्ट शक्तियों के साथ सहयोग करने या आंदोलन को अप्रत्यक्ष समर्थन देने की रणनीति बना सकता है।
दूसरी ओर, नेपाली कांग्रेस के सभापति गगन थापा ने एमाले या प्रचंड के नेतृत्व वाले किसी भी आंदोलन या गठबंधन में शामिल न होने का स्पष्ट और दृढ़ रुख अपनाया है। थापा का विश्लेषण है कि बार-बार कम्युनिस्ट शक्तियों के साथ अप्राकृतिक गठबंधन करने से कांग्रेस ने अपना वैचारिक आधार और जनता का विश्वास खोया है। तात्कालिक सत्ता के गणित से अलग रहकर पार्टी की लोकतांत्रिक पहचान को बनाए रखने का थापा का यह कदम दीर्घकालिक राजनीति के लिए रणनीतिक माना जा सकता है, लेकिन अल्पकाल में इससे कांग्रेस को पारंपरिक गठबंधन के अंकगणित से बाहर होने का जोखिम भी उतना ही है। इसने नेपाली कांग्रेस के भीतर देउवा पक्ष और थापा पक्ष के बीच की दूरी को और बढ़ा दिया है।
वहीं रास्वपा और उसके शीर्ष नेतृत्व की स्थिति इस समय राजनीति में सबसे अधिक दोहरी और दिलचस्प बनी हुई है। यद्यपि सरकार रास्वपा के वरिष्ठ नेता बालेन्द्र शाह के नेतृत्व में चल रही है, फिर भी सभापति रवि लामिछाने इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि उन पर लगातार कानूनी कार्रवाई की तलवार लटकाई जा रही है और राज्य तंत्र द्वारा उनका अपमान किया जा रहा है। अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता बालेन्द्र शाह के प्रधानमंत्री रहते हुए भी खुद पर गिरफ्तारी का खतरा बने रहने और पर्याप्त सम्मान न मिलने की बात लामिछाने महसूस कर रहे हैं। इस अपमान का बदला लेने और सरकार में रहते हुए खुले विद्रोह से होने वाले नुकसान से बचने के लिए लामिछाने ने प्रचंड के आंदोलन के साथ 'बैकडोर' या अदृश्य सहयोग का रास्ता चुना है। प्रचंड के आंदोलन को पीछे से ताकत देकर सरकार पर दबाव बढ़ाना उनकी यह दोहरी चाल है।
सरकार की अगुवाई कर रहे प्रधानमंत्री और रास्वपा के वरिष्ठ नेता बालेन्द्र शाह तथा उनका समूह इस राजनीतिक परिस्थिति और लामिछाने के कदम को बेहद सूक्ष्मता से देख रहा है। बालेन पक्ष का आंकलन है कि यदि लामिछाने अनुरोध करें तो प्रचंड आंदोलन की तीव्रता को कम कर सकते हैं या आंदोलन नियंत्रण में आ सकता है। इसी कारण हाल के दिनों में प्रधानमंत्री बालेन ने अपनी ही पार्टी के अध्यक्ष रवि की बात सुनना शुरू कर दिया है और दिल से न सही, बाहर से सम्मान और लचीलापन दिखाने की रणनीति अपनाई है। यह कोई वैचारिक निकटता या आंतरिक एकजुटता नहीं, बल्कि संभावित भीषण आंदोलन के प्रभाव को कम करने और सत्ता संतुलन साधने की विशुद्ध व्यावहारिक चाल है।
छठ के बाद संभावित आंदोलन और ध्रुवीकरण यह पुनः स्पष्ट करता है कि नेपाल में सिद्धांतों और आदर्शों से अधिक राजनीतिक अस्तित्व और अवसरवाद हावी है। एक तरफ जहां गगन थापा के नेतृत्व वाली कांग्रेस पुरानी गलतियों को न दोहराने के वैचारिक रुख पर कायम है, वहीं दूसरी तरफ एमाले, प्रचंड और देउवा पक्ष पुराने गठबंधन के जरिए सत्ता और सड़कों पर कब्जा जमाने के प्रयास में हैं। इधर, एक ही पार्टी रास्वपा के भीतर सभापति रवि लामिछाने और प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के बीच का आंतरिक अविश्वास, बदला लेने की होड़ और रणनीतिक दांव-पेच आगामी दिनों में नेपाली राजनीति को और अधिक अस्थिर, जटिल तथा अप्रत्याशित बनाने के लिए निश्चित हैं।