दक्षिण-पूर्व एशिया में आतंकवाद का खतरा अब भौतिक ठिकानों से अधिक डिजिटल दायरे में रूपांतरित होता दिख रहा है। नई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण रिपोर्टों के अनुसार, आईएसआईएस से प्रेरित ऑनलाइन कट्टरपंथी प्रचार फिर सक्रिय हो रहा है और इसका मुख्य निशाना इंटरनेट से जुड़े युवा वर्ग हैं।
Eurasia Review और क्षेत्रीय सुरक्षा विश्लेषणों में प्रकाशित आकलनों के मुताबिक, चरमपंथी समर्थक नेटवर्क सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म के जरिए वैचारिक प्रभाव फैलाने में जुटे हैं। रिपोर्टों में कहा गया है कि संगठित ढांचा कमजोर होने के बावजूद डिजिटल प्रचार तंत्र लगातार सक्रिय बना हुआ है।
जांच आधारित विश्लेषण बताता है कि टेलीग्राम, फेसबुक, टिकटॉक और अन्य सुरक्षित मैसेजिंग ऐप्स के माध्यम से वैचारिक वीडियो, धार्मिक व्याख्यान, प्रचार सामग्री और अकेले हमले के लिए प्रेरक संदेश प्रसारित किए जा रहे हैं। इस मॉडल में केंद्रीकृत आदेश की जगह प्रेरणात्मक और वैचारिक उकसावे को प्राथमिक साधन बनाया गया है।
रिपोर्टों में इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस और थाईलैंड जैसे देशों का उल्लेख है, जहाँ स्थानीय भाषाओं में तैयार सामग्री के जरिए युवाओं तक पहुंच बढ़ाने की रणनीति अपनाई गई है। विशेषज्ञों के अनुसार पहचान संकट, आर्थिक दबाव और सामाजिक अलगाव जैसी स्थितियों को संदेशों में जोड़कर प्रभाव बढ़ाया जाता है।
सुरक्षा विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि यह रुझान केवल दक्षिण-पूर्व एशिया तक सीमित नहीं रह सकता। डिजिटल नेटवर्क की सीमा-रहित प्रकृति के कारण अन्य क्षेत्रों, विशेषकर खुले ऑनलाइन समाजों वाले देशों तक भी इसका असर पहुंच सकता है।
रिपोर्टों में सरकारों को डिजिटल निगरानी मजबूत करने, वैकल्पिक सकारात्मक नैरेटिव विकसित करने और युवाओं के लिए मीडिया साक्षरता कार्यक्रम बढ़ाने की सलाह दी गई है। साथ ही सोशल मीडिया कंपनियों से चरमपंथी सामग्री की तेज पहचान और हटाने की अपेक्षा भी जताई गई है, क्योंकि उग्रवाद का नया चरण प्लेटफॉर्म-आधारित होता जा रहा है।