दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, चीन, इस समय एक गंभीर जनसांख्यिकीय मोड़ पर खड़ी है, जहाँ जन्म दर में लगातार आ रही गिरावट ने भविष्य की स्थिरता पर चिंता के बादल मंडरा दिए हैं। हालिया रिपोर्टों से पता चलता है कि चीन की जनसंख्या वृद्धि दर में आ रही यह कमी देश के आर्थिक और सामाजिक ढांचे को स्थायी रूप से प्रभावित करने वाली है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह रुझान जारी रहा, तो चीन को अपनी उत्पादन क्षमता और सामाजिक सुरक्षा प्रणाली को बचाए रखने के लिए कड़ा संघर्ष करना होगा।

इस संकट के पीछे युवाओं में विवाह के प्रति घटता रुझान और बच्चों के पालन-पोषण पर होने वाला भारी खर्च प्रमुख कारण बनकर उभरे हैं। सरकार द्वारा दी जाने वाली तमाम रियायतों और प्रोत्साहनों के बावजूद, जन्म दर में अपेक्षित सुधार नहीं देखा गया है। इसके परिणामस्वरूप, चीन में काम करने वाली आबादी (श्रम शक्ति) का अनुपात कम हो रहा है, जबकि बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। यह असंतुलन न केवल पेंशन प्रणालियों पर दबाव बढ़ा रहा है, बल्कि विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में श्रमिकों की भारी किल्लत का संकेत भी दे रहा है।

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अर्थशास्त्रियों ने आगाह किया है कि चीन का यह आंतरिक संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ा जोखिम है। एक प्रमुख वैश्विक निर्माता होने के नाते, चीन में श्रमिक अभाव का मतलब है वैश्विक कीमतों में उछाल और आपूर्ति में बाधा। आने वाले वर्षों में, चीन का आर्थिक भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपनी घटती जनसंख्या और बढ़ती बुजुर्ग आबादी के बीच कैसे संतुलन बिठाता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजिंग इस जनसांख्यिकीय चक्रव्यूह से निकलने के लिए कौन से नए नीतिगत बदलाव अपनाता है।