चीन से जुड़े समूहों द्वारा ताइवान में फर्जी मीडिया हाउस और प्रेस एजेंसियों की आड़ में जासूसी करने के आरोपों ने वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञों को चौंका दिया है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में दावा किया गया है कि चीन समर्थित इन नेटवर्क ने ताइवानी नागरिक समाज और स्थानीय संगठनों में घुसपैठ कर महत्वपूर्ण सूचनाएं जुटाने की कोशिश की है। यह रणनीति सूचना युद्ध का एक ऐसा हिस्सा है जहां पत्रकारिता के मुखौटे का उपयोग सामरिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जा रहा है।

जांच रिपोर्टों के मुताबिक, संदिग्ध व्यक्तियों ने पत्रकार बनकर उन सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों तक पहुंच बनाई जहां सामान्यतः बाहरी लोगों का प्रवेश मुश्किल होता है। ताइवानी शोधकर्ताओं का मानना है कि यह केवल डेटा इकट्ठा करने का प्रयास नहीं है, बल्कि जनता की सोच को प्रभावित करने की एक मनोवैज्ञानिक योजना है। इसके अतिरिक्त, चीनी खुफिया एजेंसियों द्वारा विदेशी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का उपयोग करने की खबरें भी आई हैं, जो आधुनिक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में तकनीक के दुरुपयोग को दर्शाती हैं।

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चीन द्वारा अपनाई जा रही यह नई पद्धति सैन्य गतिविधियों से हटकर सूचना प्रभाव और साइबर निगरानी पर केंद्रित है। ताइवान इस डिजिटल संघर्ष के केंद्र में है, लेकिन इसका असर अब नेपाल जैसे पड़ोसी देशों में भी महसूस किया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि सूचना युद्ध और साइबर प्रभाव का खतरा अब केवल बड़ी शक्तियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह छोटे देशों की सुरक्षा और मीडिया की विश्वसनीयता के लिए भी एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।