काठमांडू, असार 17। चीन द्वारा नया 'जातीय एकता कानून' (Ethnic Unity Law) लागू किए जाने के बाद अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों, भाषा और सांस्कृतिक पहचान पर नियंत्रण और अधिक बढ़ने की चिंता व्यक्त की गई है। विभिन्न मानवाधिकार संगठनों और अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया है कि इस कानून ने सांस्कृतिक आत्मसात (assimilation) को कानूनी आधार दे दिया है।

वहीं, चीनी सरकार ने कहा है कि नए कानून का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना, जातीय सद्भाव बनाए रखना और विभाजनकारी गतिविधियों को नियंत्रित करना है। बीजिंग के अनुसार, एक ऐसी नीति अपनाई गई है जिसके तहत सभी जातीय समुदायों को साझा राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करते हुए संविधान और कानून के अनुसार आगे बढ़ना होगा।

लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने चेतावनी दी है कि तिब्बत, झिंजियांग और इनर मंगोलिया जैसे क्षेत्रों के अल्पसंख्यक समुदायों की भाषा, संस्कृति और धार्मिक स्वतंत्रता में और अधिक हस्तक्षेप हो सकता है। उनके अनुसार, स्थानीय भाषा और सांस्कृतिक प्रथाओं को कमजोर करते हुए राज्य द्वारा निर्देशित राष्ट्रीय पहचान को प्राथमिकता देने का प्रयास किया जा रहा है।

भू-राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, नए कानून से न केवल चीन की आंतरिक शासन नीति बल्कि मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय बहस भी और तेज होने की संभावना है। इस विषय पर पश्चिमी देश और मानवाधिकार संगठन चीन से और अधिक स्पष्टता तथा पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं।

चीन ने हालांकि दोहराया है कि उसकी जातीय नीति देश का आंतरिक मामला है और राष्ट्रीय सुरक्षा तथा सामाजिक स्थिरता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

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