चीन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने के लिए "मानसिक उपचार" को एक दमनकारी उपकरण के रूप में इस्तेमाल किए जाने की खबरें सामने आई हैं। हालिया अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, जो नागरिक सरकारी नीतियों की आलोचना करते हैं या प्रशासन से न्याय की गुहार लगाते हैं, उन्हें जबरन मानसिक अस्पतालों में भर्ती कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया को "साइकियाट्रिक डिटेंशन" कहा जा रहा है, जिसका उद्देश्य विरोधियों को कानूनी दायरे से बाहर रखकर शांत करना है।

इन रिपोर्टों में बताया गया है कि स्थानीय प्रशासन से असहमति जताने वाले व्यक्तियों को "मानसिक रूप से अस्थिर" घोषित कर दिया जाता है। अस्पताल में भर्ती होने के बाद, इन लोगों को न तो वकील से मिलने की अनुमति दी जाती है और न ही उनके परिवारों को इसकी सूचना दी जाती है। कई मामलों में बिना किसी चिकित्सीय आवश्यकता के उन्हें जबरन दवाएं दी जाती हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह प्रणाली विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों के उन नागरिकों को प्रभावित कर रही है जो भ्रष्टाचार या अन्याय के खिलाफ याचिका दायर करते हैं।

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अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने चीन सरकार से इस संदिग्ध अभ्यास को तुरंत बंद करने और पारदर्शिता बरतने की मांग की है। हालांकि, चीन इन आरोपों को सिरे से खारिज करता रहा है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि चीन में असहमति के सुरों को दबाने के लिए राज्य वैकल्पिक और अमानवीय तरीके अपना रहा है, जिससे वहां के मानवाधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आगामी समय में अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच चीन की प्रतिक्रिया और इस प्रणाली के भविष्य पर सबकी नजर रहेगी।