काठमांडू। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण के अनुसार, वैश्विक दुर्लभ खनिज (रेयर अर्थ) बाजार में चीन का लंबे समय से चला आ रहा वर्चस्व धीरे-धीरे चुनौती का सामना कर रहा है। प्रकाशित सामग्री के अनुसार, विभिन्न देशों द्वारा वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखला के विकास, नई खदानों के संचालन और रणनीतिक साझेदारी के विस्तार के साथ ही चीन का प्रभाव पहले की तुलना में कमजोर होने के संकेत मिले हैं।
विश्लेषण के अनुसार, इलेक्ट्रिक वाहनों, सेमीकंडक्टर, रक्षा उद्योग, नवीकरणीय ऊर्जा और उच्च तकनीक वाले उपकरणों के उत्पादन के लिए दुर्लभ खनिजों की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसी मांग को ध्यान में रखते हुए अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय देशों और अन्य साझेदार राष्ट्रों ने नए स्रोतों की खोज और उत्पादन विस्तार में निवेश बढ़ाया है।
प्रकाशित विश्लेषण में उल्लेख किया गया है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भर होने से रोकने के लिए विभिन्न राष्ट्र दीर्घकालिक रणनीतियां अपना रहे हैं। इससे दुर्लभ खनिजों के अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ-साथ आपूर्ति जोखिम कम होने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण चीन के लिए भी अपने खनिज और प्रसंस्करण उद्योग को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की स्थिति उत्पन्न हो गई है। आपूर्ति विविधीकरण की प्रवृत्ति भविष्य में वैश्विक औद्योगिक उत्पादन और प्रौद्योगिकी क्षेत्र के शक्ति संतुलन को भी प्रभावित कर सकती है।
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि दुर्लभ खनिजों की सुरक्षित, स्थिर और विविध आपूर्ति सुनिश्चित करने की प्रतिस्पर्धा आने वाले दशक में वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक रणनीति का मुख्य विषय बनने की उम्मीद है।