काठमांडू | अंतर्राष्ट्रीय डेस्क - हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलती सुरक्षा और भू-राजनीतिक स्थिति के बीच भारत और जापान के बीच रणनीतिक साझेदारी और मजबूत होने का विश्लेषण सामने आया है। रक्षा, प्रौद्योगिकी, आर्थिक सहयोग और समुद्री सुरक्षा के क्षेत्रों में दोनों देशों द्वारा सहयोग का विस्तार किए जाने के समय इस संबंध को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।

विश्लेषकों के अनुसार, भारत और जापान के बीच संबंध अब केवल पारंपरिक आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि रक्षा प्रौद्योगिकी, आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain), सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा और समुद्री सुरक्षा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों पर केंद्रित होने लगे हैं। इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक स्वतंत्र, खुले और नियम-आधारित व्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

दोनों देशों ने हाल के वर्षों में संयुक्त सैन्य अभ्यास, बुनियादी ढांचे के विकास, उच्च प्रौद्योगिकी में निवेश और समुद्री मार्गों की सुरक्षा में सहयोग को तेज किया है। जापान भारत के प्रमुख विकास भागीदारों में से एक रहा है, जबकि भारत जापान की हिंद-प्रशांत रणनीति में एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में स्थापित होता जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे समय में जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में विविधीकरण की आवश्यकता बढ़ रही है, भारत-जापान सहयोग विनिर्माण, प्रौद्योगिकी और निवेश के नए अवसर पैदा कर रहा है। माना जा रहा है कि इससे क्षेत्रीय आर्थिक लचीलापन बढ़ेगा और वैश्विक बाजार में दोनों देशों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी मजबूत होगी।

मौजूदा दौर में जहां भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है, भारत और जापान के बीच विश्वास-आधारित साझेदारी को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के एक महत्वपूर्ण आधार के रूप में देखा जा रहा है। विश्लेषकों को उम्मीद है कि लोकतांत्रिक मूल्यों, नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था और साझा सुरक्षा हितों के कारण आने वाले वर्षों में दोनों देशों के बीच सहयोग और अधिक व्यापक तथा गहरा होगा।

अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषकों का निष्कर्ष है कि भारत की सक्रिय कूटनीति और जापान के साथ मजबूत रणनीतिक संबंध हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक नया शक्ति संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।