सिंधु जल समझौते (IWT) को स्थगित रखने का निर्णय पाकिस्तान द्वारा कई गंभीर उकसावों के सामने भारत के संयम के अंत का प्रतीक है। वर्ष 1960 में हस्ताक्षरित और दो विरोधी पड़ोसियों के बीच निरंतर सहयोग के एक दुर्लभ उदाहरण के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहे गए इस समझौते ने युद्धों, राजनीतिक उथल-पुथल, सैन्य संकटों और लंबे समय तक चली कूटनीतिक शत्रुता के बावजूद केवल भारत के उदार और अच्छे पड़ोसी वाले दृष्टिकोण के कारण ही खुद को बचाए रखा। इस तरह के महत्वपूर्ण समझौते पारस्परिकता, विश्वास, सद्भाव और सहयोग के प्रति वास्तविक प्रतिबद्धता पर निर्भर करते हैं। पिछले छह दशकों में, पाकिस्तान के लगातार अड़ंगा लगाने, तकनीकी मामलों के राजनीतिकरण और जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में वैध विकास को बाधित करने के लिए संधि तंत्र के बार-बार दुरुपयोग ने इन बुनियादी सिद्धांतों को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया। सबसे बड़ी बात यह है कि पाकिस्तान ने आतंकवाद के निर्यात की अपनी कुटिल नीति को जारी रखा, जिसने उस सद्भावना, मित्रता और अच्छे विश्वास की नींव को पूरी तरह से नष्ट कर दिया जिस पर यह संधि टिकी थी।

जबकि भारत ने लगातार इस संधि को बनाए रखने का बोझ उठाया, वहीं पाकिस्तान ने खुद को पीड़ित दिखाने का एक झूठा नैरेटिव तैयार किया और भारत के हर वैध प्रस्ताव को अपने अस्तित्व के लिए खतरा बताया। भारत ने संधि की शर्तों का अक्षरशः और उसकी मूल भावना के साथ लगातार पालन किया, और अक्सर अपने औपचारिक दायित्वों से परे जाकर भी लचीलापन दिखाया। इसके विपरीत, पाकिस्तान ने इस संधि को सहयोग और आपसी लाभ के साधन के रूप में नहीं, बल्कि पश्चिमी नदियों पर भारत के कानूनी अधिकारों को बाधित करने के लिए एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।

अवरोध पैदा करने का पाकिस्तान का यह तरीका संधि के लागू होने के तुरंत बाद ही सामने आ गया था। एक नए पनबिजली संयंत्र के लिए संधि के तहत भारत द्वारा भेजी गई पहली सूचना मार्च 1962 में भेजी गई थी, जो इसके अनुसमर्थन के मुश्किल से एक वर्ष बाद की बात है। यह परियोजना बहुत छोटी थी: केवल 200 किलोवाट का रन-ऑफ-रिवर प्लांट, जिसमें केवल 25 क्यूसेक पानी का उपयोग किया जाना था, जिसमें पानी का कोई उपभोग्य उपयोग नहीं था और एक सेकंड के लिए भी पानी को रोकना नहीं था। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सीमा से सैकड़ों किलोमीटर ऊपर स्थित एक दूरस्थ आदिवासी आबादी को बिजली प्रदान करना था। फिर भी पाकिस्तान ने इस पर आपत्ति जताई। दिसंबर 1963 में इसी तरह के आकार की एक दूसरी परियोजना की सूचना दी गई, तो उसे भी कमजोर आधार पर चुनौती दी गई। ये आपत्तियां सितंबर 1971 तक खिंचती रहीं, जब सिंधु जल के लिए भारतीय आयुक्त ने किसी भी पक्ष के रुख पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना इस मामले को बंद करने का आग्रह किया। खुद इस संधि पर बातचीत करने में आठ साल लगे थे, और 200 किलोवाट की एक मामूली परियोजना पर आपत्तियों से निपटने में भी लगभग उतना ही समय लग गया। ऐसी घटनाओं ने एक स्थापित पैटर्न को उजागर किया: वास्तविक योग्यता से रहित केवल प्रक्रियात्मक विरोध।

संघर्ष के दौर में इस संधि का पाकिस्तान द्वारा अपने फायदे के लिए और बेईमानी से किया गया उपयोग और भी स्पष्ट हो गया। नवंबर 1965 में, बड़े पैमाने पर संघर्ष शुरू होने के बाद, पाकिस्तान ने आरोप लगाया कि उसे सेंट्रल बारी दोआब चैनलों में पानी की आपूर्ति नहीं मिली। भारत ने जवाब दिया कि पाकिस्तान संधि के तहत आवश्यक अनुरोध प्रस्तुत करने में विफल रहा। इसके अलावा, पाकिस्तानी तरफ से की जा रही गोलाबारी और गोलीबारी के कारण फिरोजपुर हेडवर्क्स से पानी का नियंत्रण भौतिक रूप से असंभव हो गया था, जिसके दौरान सिंचाई कर्मियों की मौत हो गई थी या वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उन परिस्थितियों में भारतीय नहरों के लिए भी कोई नियंत्रण संभव नहीं था। संघर्ष विराम के बाद भी लगातार अकारण गोलीबारी के बावजूद, भारत ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान का अनुमानित हिस्सा सतलुज में छोड़ दिया गया था और आगे भेज दिया गया था।

जून 1973 में एक बेहद चौंकाने वाली घटना हुई, जब पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों पर अपने अवैध कब्जे का फायदा उठाते हुए और एक स्थानीय धारा पर ऊपरी तटवर्ती राज्य के रूप में काम करते हुए पुंछ बिजली चैनल को पानी की आपूर्ति कई दिनों तक बंद कर दी। इस व्यवधान से क्षेत्र में बिजली उत्पादन और सिंचाई दोनों प्रभावित हुए। यह संधि का सीधा और गंभीर उल्लंघन था। भारत ने विरोध दर्ज कराया और पानी की आपूर्ति तुरंत बहाल करने की मांग की। मार्च 1975 में पाकिस्तान के अंतिम जवाब ने इस मामले को बेहद मामूली बताते हुए दावा किया कि यह व्यवधान धारा के "प्राकृतिक रूप से मार्ग बदलने" के कारण हुआ था। भारत ने संयम दिखाया और व्यापक सहयोग ढांचे को बनाए रखने के लिए इस मामले को और अधिक तूल नहीं दिया। हालांकि, उस संयम का बदला कभी वैसे नहीं मिला।

भारत की प्रमुख पनबिजली परियोजनाओं से जुड़े विवाद भी इसी कहानी को दोहराते हैं। सलाल पनबिजली परियोजना विवादास्पद बन गई क्योंकि पाकिस्तान ने जुलाई 1970 में इस पर बेबुनियाद आपत्तियां उठाईं, जबकि परियोजना का डिजाइन पूरी तरह से संधि के अनुरूप था। असाधारण उदारता दिखाते हुए, भारत उन बड़े डिजाइन संशोधनों पर सहमत हो गया जो संधि के तहत आवश्यक नहीं थे, जिसमें पॉन्डेज को शून्य करना और निचले स्तर के आउटलेट को बंद करना शामिल था। इन रियायतों के अंततः गंभीर परिणाम हुए। बांध ने गाद को साफ करने की अपनी क्षमता खो दी, और कुछ ही वर्षों में इसकी डिजाइन की गई भंडारण क्षमता (लगभग 284 MCM) गाद से भर गई, जिससे इसकी दीर्घकालिक दक्षता काफी कम हो गई। सलाल जलाशय को पहली बार भरने के दौरान भी, पाकिस्तान ने मांग की थी कि भारत सलाल के मृत भंडारण (डेड स्टोरेज) में जमा हुए पानी की भरपाई के लिए पूर्वी नदियों से उतना ही पानी दे, जो संधि के प्रावधानों से पूरी तरह बाहर की एक असाधारण मांग थी। फिर भी भारत ने इस मांग को भी पूरा किया।

भारत की उदारता का एक और बड़ा उदाहरण कश्मीर घाटी में तुलबुल नौवहन परियोजना (Tulbul Navigation Project) का स्थगन था। पाकिस्तान की आपत्तियों को देखते हुए, भारत ने 1987 में आपसी सहमति से समाधान की उम्मीद में काम रोक दिया। यह परियोजना आज भी अधर में लटकी हुई है। पाकिस्तानी मीडिया और बयानों में इस परियोजना को झेलम नदी पर पानी जमा करने और पाकिस्तान में पानी के बहाव को नियंत्रित करने के भारतीय इरादों के प्रतीक के रूप में पेश किया गया। निजी तौर पर, पाकिस्तानी अधिकारियों ने स्वीकार किया कि इस परियोजना से शुष्क मौसम में पानी का बहाव बेहतर होने से पाकिस्तान को भी फायदा हो सकता है। हालांकि, सार्वजनिक रूप से इस मुद्दे को दशकों तक खींचा गया और पाकिस्तान सार्थक समाधान में देरी करता रहा। जो परियोजना एक आपसी सहयोग का जरिया बन सकती थी, उसे कृत्रिम अविश्वास के एक अन्य मंच में बदल दिया गया।

यही पैटर्न बगलीहार पनबिजली परियोजना में भी दोहराया गया। भारत द्वारा पहली बार 1992 में इस परियोजना की जानकारी दी गई थी। इसके बाद स्थायी सिंधु आयोग, सरकारी चैनलों और सचिव स्तर की वार्ताओं में लंबी चर्चाएं हुईं। भारत ने बार-बार द्विपक्षीय बातचीत की और पाकिस्तानी चिंताओं को दूर करने के लिए डिजाइन में बदलाव की पेशकश भी की। इसके बावजूद, पाकिस्तानी मीडिया के एक धड़े ने यह दुष्प्रचार किया कि बगलीहार पाकिस्तान को रेगिस्तान बना देगा। अंततः, पाकिस्तान इस मामले को संधि के तहत नियुक्त तटस्थ विशेषज्ञ के पास ले गया। तटस्थ विशेषज्ञ के फैसले ने भारत के रुख का पुरजोर समर्थन किया और पुष्टि की कि परियोजना संधि के प्रावधानों के अनुरूप थी, जिसमें केवल सीमित तकनीकी बदलावों की आवश्यकता थी। पाकिस्तान को अस्तित्व के खतरे का झूठा नैरेटिव निष्पक्ष जांच के सामने ध्वस्त हो गया।

किशनगंगा परियोजना का भी यही हश्र हुआ। इसकी जानकारी 1994 में दी गई थी। योजना के चरण में 1989 के दौरान, भारत ने पाकिस्तान से डेटा मांगा था ताकि निचले प्रवाह में कृषि और पनबिजली उपयोग का हिसाब रखा जा सके। पाकिस्तान ने दावा किया कि सारा पानी पहले ही नीलम-झेलम लिंक पनबिजली परियोजना के लिए समर्पित है। इसने 1,33,209 हेक्टेयर सिंचित क्षेत्र का बढ़ा-चढ़ाकर आंकड़ा भी पेश किया, जिसे वह न तो आयोग के सामने और न ही मध्यस्थता न्यायालय के समक्ष साबित कर सका। जब भारत को काफी देरी के बाद 2008 में नीलम-झेलम परियोजना स्थल के विशेष निरीक्षण की अनुमति दी गई, तो पाकिस्तान का यह दावा पूरी तरह से झूठा साबित हुआ कि परियोजना 1988 से निर्माणाधीन थी। इसके अलावा, भारत ने तीसरे पक्ष की मध्यस्थता पर सहमत होने से पहले व्यापक द्विपक्षीय प्रयास किए। किशनगंगा मध्यस्थता न्यायालय ने अंततः बिजली उत्पादन के लिए किशनगंगा/नीलम से झेलम नदी में पानी मोड़ने के भारत के अधिकार को बरकरार रखा। लेकिन इस फैसले के बाद भी पाकिस्तान परियोजना के डिजाइन पर आपत्तियां उठाता रहा और अनिश्चितता बनाए रखी। एक बार फिर, वास्तविकता राजनीतिक बयानबाजी से बिल्कुल अलग थी।

इस प्रकार, संधि के लागू होने के बाद से ही, पश्चिमी नदियों पर भारत की लगभग हर पनबिजली परियोजना, चाहे उसका आकार या डिजाइन कुछ भी हो, पाकिस्तान द्वारा उस पर आपत्ति जताई गई। पाकिस्तान की आपत्तियों ने भारतीय पनबिजली परियोजनाओं के डिजाइन को 1960 के दशक के तकनीकी मानकों तक सीमित करने की कोशिश की है, जबकि यह संधि स्वयं आधुनिक और बेहतर इंजीनियरिंग प्रथाओं पर विचार करने की अनुमति देती है।

आज भी, पाकिस्तान किशनगंगा और रात्ले परियोजनाओं के खिलाफ अपनी अड़ंगेबाजी जारी रखे हुए है। उसने दो अलग-अलग विवाद समाधान तंत्रों (तटस्थ विशेषज्ञ और मध्यस्थता न्यायालय) के समक्ष समानांतर कार्यवाही चलाकर मामले को और बिगाड़ दिया है - जो संधि का स्पष्ट उल्लंघन था।

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पाकिस्तान के इन कदमों ने संधि की प्रस्तावना में परिकल्पित सहयोग की भावना को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि भारत में, विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में, यह अहसास बढ़ गया है कि पाकिस्तान द्वारा संधि का राजनीतिकरण और हठधर्मिता इस क्षेत्र में जल संसाधनों के विकास में एक बड़ा रोड़ा है। सालों से, पाकिस्तान के अड़ियल रवैये और इस क्षेत्र की उभरती जरूरतों और बदलती जमीनी हकीकतों को देखते हुए इस संधि की प्रासंगिकता पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं।

प्रक्रियागत असहमतियों से इतर शत्रुता का एक व्यापक संदर्भ है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जम्मू-कश्मीर में नागरिकों, बुनियादी ढांचे और विकास परियोजनाओं को निशाना बनाकर किए जाने वाले लगातार सीमा पार आतंकवाद ने सहकारी संधि के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक माहौल को गंभीर रूप से दूषित कर दिया है। सिंधु नदी प्रणाली के पानी के उपयोग से जुड़ी परियोजनाएं जैसे तुलबुल नौवहन परियोजना आदि भी आतंकी हमलों से अछूती नहीं रही हैं। भारत दशकों से पाकिस्तान की आतंकवाद निर्यात और प्रायोजित करने की नीति का शिकार रहा है, और पाकिस्तान ने अपनी इस आदत को बदलने का कोई संकेत नहीं दिखाया है। इतने रणनीतिक महत्व के समझौतों के लिए न्यूनतम विश्वास की आवश्यकता होती है। एक क्षेत्र में अस्थिरता को प्रायोजित करते हुए दूसरे क्षेत्र में स्थायी सहयोग की उम्मीद करना असंभव है।

इस मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तान का जल कुप्रबंधन है। जबकि पाकिस्तान भारत के कदमों से अपनी जल सुरक्षा के लिए कथित खतरे का रोना रोता है, वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। वास्तव में, पाकिस्तान के अपने आंतरिक स्वीकारोक्ति ने भारत के खिलाफ उसके आरोपों के खोखलेपन को उजागर कर दिया है। उदाहरण के लिए, 2010 में पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने सार्वजनिक रूप से इस दावे को खारिज किया था कि पाकिस्तान में पानी की किल्लत के लिए भारत जिम्मेदार है। उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान को सालाना लगभग 104 मिलियन एकड़-फीट (MAF) पानी मिलता है, लेकिन वह केवल 70 MAF का ही उपयोग कर पाता है, जिससे कुप्रबंधन के कारण लगभग 34 MAF पानी बर्बाद हो जाता है। उन्होंने बेहद स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हुए पूछा था: "वह 34 मिलियन एकड़ फीट पानी कहां जा रहा है? क्या भारत आपसे वह पानी चुरा रहा है? नहीं, वह ऐसा नहीं कर रहा है। कृपया खुद को धोखा न दें... हम उस पानी का कुप्रबंधन कर रहे हैं।" उन्होंने पाकिस्तान के भीतर विवादों को "बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने" और "दूसरों पर दोष मढ़ने" की प्रवृत्ति की भी आलोचना की और घरेलू स्तर की कमियों जैसे खराब सिंचाई प्रणाली, रिसाव और पानी की बर्बादी पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह किया।

यह स्वीकारोक्ति इस पूरे विवाद की जड़ है। पाकिस्तान की जल संबंधी आशंकाएं किसी भारतीय परियोजना का परिणाम नहीं हैं, बल्कि पाकिस्तान की अपनी संरचनात्मक और संस्थागत विफलताओं का परिणाम हैं: अपर्याप्त भंडारण क्षमता, नहरों से भारी रिसाव, फसलों का गलत चयन, कम सिंचाई दक्षता, खराब रखरखाव और विभिन्न प्रांतों के बीच आपसी विवाद। इन आंतरिक चुनौतियों को भारत विरोधी बयानबाजी का सहारा लेकर ठीक नहीं किया जा सकता।

यहां पाकिस्तान के खुद के 2018 के राष्ट्रीय जल नीति दस्तावेज से कुछ तथ्य दिए गए हैं। पाकिस्तान की जल प्रबंधन प्रणाली में गंभीर कमियां हैं जिससे उपलब्ध संसाधनों की भारी बर्बादी होती है। सिंधु नदी प्रणाली से पाकिस्तान को मिलने वाले लगभग 140 MAF पानी में से केवल 104.0 मिलियन एकड़-फीट (MAF) पानी ही सालाना नहर प्रणाली के माध्यम से मोड़ा जा सकता है, और उसमें से केवल 58.3 MAF ही वास्तव में खेतों तक पहुंच पाता है। इसका मतलब है कि परिवहन के दौरान लगभग 46.7 MAF पानी बर्बाद हो जाता है। संक्षेप में, सिंधु नदी प्रणाली से निकाला गया लगभग आधा पानी खेतों तक पहुंच ही नहीं पाता। एक चिंताजनक वास्तविकता यह भी है कि औसतन 35 MAF पानी पाकिस्तान से बिना किसी उपयोग के सीधे अरब सागर में बह जाता है। पानी की यह कुल बर्बादी संधि के तहत भारत के हिस्से से दोगुनी से भी अधिक है, और यह विशुद्ध रूप से पाकिस्तान की अक्षमता और विफलता के कारण नष्ट हो रहा है।

छह दशकों से अधिक समय से, पाकिस्तान के राजनीतिक और मीडिया प्रतिष्ठान का एक हिस्सा बार-बार यह नैरेटिव फैलाता रहा है कि भारत की पनबिजली परियोजनाएं "पानी चुराने", झेलम और चेनाब को नियंत्रित करने, सूखा या बाढ़ लाने, पंजाब की कृषि को नष्ट करने और अंततः "पाकिस्तान को रेगिस्तान में बदलने" के लिए बनाई गई हैं। यह दुष्प्रचार सलाल और तुलबुल से लेकर बगलीहार, किशनगंगा और रात्ले तक हर भारतीय परियोजना के साथ सामने आया - जिसने सामान्य तकनीकी असहमतियों को देश के अस्तित्व के लिए खतरे के रूप में पेश किया। हालांकि, सलाल, बगलीहार और किशनगंगा जैसी परियोजनाओं के चालू होने के बाद, ऐसी कोई भी विनाशकारी भविष्यवाणियां सच साबित नहीं हुईं। इन परियोजनाओं के कारण न तो पाकिस्तान सूखा, न ही उसकी नदियां गायब हुईं और न ही उसकी कृषि नष्ट हुई।

इसके बजाय, भारतीय बांधों को लेकर फैलाया गया यह डर समय-समय पर अपने असली रूप में उजागर हुआ: यह कोई जलवैज्ञानिक (hydrological) वास्तविकता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक रणनीति थी। इसने द्विपक्षीय विवादों का अंतरराष्ट्रीयकरण करने, भारत पर राजनयिक दबाव बनाने और संधि के तहत वैध विकास परियोजनाओं में देरी करने का काम किया। सहयोग के लिए बने संधि तंत्र का बार-बार और कुटिलतापूर्वक अवरोध के हथियारों के रूप में दुरुपयोग किया गया। इसके अलावा, ईमानदारी के बजाय धोखेबाजी को चुनकर और आतंकवाद को राज्य की नीति के रूप में उपयोग करके, पाकिस्तान ने उस सद्भावना और मित्रता को पूरी तरह नष्ट कर दिया जिस पर यह संधि आधारित थी।

सिंधु जल संधि को स्थगित रखने के भारत के फैसले को इसी पृष्ठभूमि में समझा जा सकता है, जो पाकिस्तान के निरंतर असहयोग, लगातार खराब नियत, संधि के व्यवस्थित दुरुपयोग और सीमा पार आतंकवादी हमलों के चरम परिणाम को दर्शाता है।

इस पूरे घटनाक्रम से एक सबक स्पष्ट रूप से सामने आता है: अंतरराष्ट्रीय समझौते और संधियां केवल हस्ताक्षर करने से नहीं, बल्कि सभी पक्षों द्वारा उनका सम्मान किए जाने से ही टिकती हैं। ऐसी व्यवस्थाओं की दीर्घायु कानूनी सिद्धांतों और दस्तावेजों पर नहीं, बल्कि आपसी सम्मान, साझा जिम्मेदारी और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के बुनियादी सिद्धांतों के प्रति वास्तविक प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है। इन बुनियादी मानदंडों को पाकिस्तान द्वारा खारिज किए जाने के कारण ही आज यह स्थिति उत्पन्न हुई है। इसके लिए वह पूरी तरह खुद जिम्मेदार है।