भारत सरकार ने लिपुलेख दर्रे से होकर होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा पर अपना रुख फिर से स्पष्ट किया है। यह स्पष्टीकरण नेपाल सरकार द्वारा रविवार को जारी उस प्रेस नोट के बाद आया है, जिसमें नेपाल ने भारत और चीन द्वारा इस मार्ग को खोले जाने पर अपनी चिंता व्यक्त की थी।

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने रविवार को जारी एक बयान में कहा कि लिपुलेख दर्रे का उपयोग 1954 से ही कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए किया जाता रहा है। भारत के अनुसार, यह कोई नया बदलाव नहीं है बल्कि एक ऐतिहासिक निरंतरता है। मंत्रालय ने यह भी कहा कि वह नेपाल के क्षेत्रीय दावों को ऐतिहासिक साक्ष्यों और प्रमाणों से परे मानता है। भारत ने स्पष्ट किया कि क्षेत्रीय दावों का एकपक्षीय विस्तार व्यवहारिक रूप से स्वीकार्य नहीं किया जा सकता।

हालाँकि, भारत ने अपने रुख पर अडिग रहने के साथ-साथ नेपाल के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों के महत्व को भी रेखांकित किया है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत नेपाल के साथ सभी महत्वपूर्ण विषयों पर रचनात्मक संवाद के लिए पूरी तरह तैयार है। भारत ने उम्मीद जताई है कि सीमा से संबंधित लंबित मुद्दों का समाधान आपसी कूटनीतिक माध्यमों से निकाला जा सकता है।

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लिपुलेख का मुद्दा दोनों देशों के बीच लंबे समय से एक संवेदनशील कूटनीतिक विषय रहा है। भारत की इस ताजा प्रतिक्रिया के बाद अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या दोनों पड़ोसी देश बातचीत के जरिए सीमा विवाद का कोई सर्वमान्य समाधान निकाल पाएंगे।

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