पूर्व प्रधान न्यायाधीश चोलेंद्र शमशेर जबरा 68 वर्ष के हो गए हैं। हमारे प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह 36 वर्ष के हो गए हैं। लगभग आधी उम्र के युवा प्रधानमंत्री द्वारा सेवानिवृत्त पूर्व प्रधान न्यायाधीश से ही सुरक्षा खतरा महसूस करने की चर्चा इस समय बाजार में व्यापक है। पूर्व प्रधान न्यायाधीश को आधी रात को घर पर पुलिस भेजकर नियंत्रण में लेने और चौतरफा विरोध के बाद 'सुरक्षात्मक हिरासत' का बहाना बनाकर छोड़ देने की हरकत ने वर्तमान राज्य सत्ता की संकीर्ण मानसिकता और डर को उजागर कर दिया है।

आखिर श्रीमान् चोलेंद्र की बात मानने वाला कौन है? वह किसे प्रभावित कर सकते हैं? ज्यादा से ज्यादा वही न्यायाधीश होंगे, कर्मचारी होंगे या किसी पार्टी के नेता होंगे। लेकिन एक प्रसिद्ध कहावत है— 'अपनी थैली अच्छी तरह बाँधो, दूसरों पर चोरी का आरोप मत लगाओ।' आज राज्य के सभी निकाय, शक्ति और तंत्र प्रधानमंत्री जी की ही थैली के भीतर हैं। प्रधानमंत्री जी को अपनी थैली अच्छी तरह कसनी आनी चाहिए, पूर्व प्रधान न्यायाधीश चोलेंद्र पर बिना कारण चोरी का आरोप नहीं लगाना चाहिए। चोलेंद्र चोर नहीं हैं।

सामान्य व्यक्ति के घर में तो सुख-दुख में कई दोस्त और रिश्तेदार आते-जाते रहते हैं। श्रीमान् चोलेंद्र तो देश के पूर्व प्रधान न्यायाधीश रहे हैं। नेपाल में कोई कठिनाई होने पर या अन्याय होने पर थोड़े प्रभावशाली व्यक्ति के पास जाने की पुरानी परंपरा है। उनके यहाँ लोगों का मिलने आना कोई अजीब बात नहीं है। दूसरी तरफ, हमारे प्रधानमंत्री जी का अपना स्वभाव है— जनता और पत्रकारों से खास मिलते नहीं हैं, शाम 5 बजे के बाद घर में बेटी को खिलाकर समय बिताने की उनकी आदत है, ऐसी चर्चा सुनी जाती है। मेरा भी कई लोगों से मिलने-जुलने का स्वभाव नहीं है, लेकिन सभी की शैली एक जैसी नहीं होती।

श्रीमान् चोलेंद्र के घर रिश्तेदार और संबंधी मिलने आने के ही आधार पर उन्हें गिरफ्तार करना, उनके रिश्तेदारों को दुख देना पूरी तरह गलत है। इस तरह सेवानिवृत्त अधिकारियों को अकारण परेशान करने और दुख देने का काम रुकना चाहिए। वर्तमान शासन तो चुनाव से पहले प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने द्वारा भाषणों में कहे अनुसार राम राज्य की तरह चलाया जाना चाहिए। क्या चुनाव के समय दिखाया गया सुशासन का सपना यही है?

अभी तो बाजार में अपनी ही पार्टी के नेता और न्यायाधीश के ही गिरफ्तार होने की चर्चा चरम पर है। यदि कोई राजनीतिक कदम उठाया गया तो रवि लामिछाने भी सुरक्षित नहीं हैं! ऐसे आतंक का परिणाम आखिर क्या होगा?

आधी रात को पुलिस भेजकर बिना वारंट गिरफ्तार करना और बाद में 'सुरक्षात्मक हिरासत' का बहाना बनाना पुराने निरंकुश शासकों की ही शैली है, जिसने नई सरकार के नैतिक धरातल पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

क्या कोई भी सरकार संवैधानिक मूल्यों और मान्यताओं को कुचलकर तथा प्रशासनिक उपायों का दुरुपयोग करके राजनीतिक या न्यायिक क्षेत्र के पात्रों को इस तरह दरकिनार कर सकती है?

यदि पूर्व प्रधान न्यायाधीश चोलेंद्र शमशेर जबरा सचमुच मामलों में हस्तक्षेप कर रहे थे या राज्य के खिलाफ कोई साजिश रच रहे थे तो उन पर औपचारिक कानूनी मामला दर्ज किया जाना चाहिए था। इस तरह गैर-कानूनी और अनौपचारिक हिरासत में रखने की प्रथा ने नागरिक स्वतंत्रता पर ही बड़ा खतरा पैदा कर दिया है।

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