कानून, न्याय एवं संसदीय कार्य मंत्री सोबिता गौतम ने जघन्य अपराधों में सख्त सजा का प्रावधान करने के लिए सात दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपने हेतु सात सदस्यीय 'गरिमा न्याय संकल्प समिति' के गठन की घोषणा की है। यह कदम तीन वर्षीय मासूम बच्ची गरिमा की बलात्कार के बाद हुई हत्या और इसमें एक १४ वर्षीय किशोर पर लगे आरोपों के बाद उठाया गया है।
सोशल मीडिया फेसबुक पर जारी एक बयान के अनुसार कल शाम गृह मंत्रालय में पीड़ित बच्ची के माता-पिता के साथ हुई मुलाकात के बाद यह निर्णय लिया गया। यह समिति जनभावनाओं और नागरिक अपेक्षाओं के अनुरूप मौजूदा कानूनों की समीक्षा करेगी तथा कठोरतम दंड निर्धारित करने के लिए सुझाव प्रस्तुत करेगी।
फांसी की सजा की मांग पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कानून मंत्री गौतम ने कहा कि संविधान की धारा १६(२) मृत्युदंड देने वाले कानून बनाने का निषेध करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के कारण सरकार संविधान के दायरे से बाहर जाकर सजा की घोषणा नहीं कर सकती तथा तीव्र आक्रोश के बीच भी शासन को कानून के शासन की सीमाओं का पालन करना अनिवार्य है।
मामले को 'मीडिया ट्रायल' बनने से बचाने की अपील करते हुए मंत्री गौतम ने चेतावनी दी कि अपुष्ट विवरण फैलाने और सोशल मीडिया के जरिए फैसला सुनाने की प्रवृत्ति से न्याय प्रक्रिया कमजोर होती है। उन्होंने निर्मला पंत मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि संवेदनशील अपराधों में सबूतों की सुरक्षा और निष्पक्ष जांच के लिए पुलिस तथा राज्य तंत्र को निर्बाध रूप से कार्य करने देना चाहिए।
अपने एक पुराने वीडियो को लेकर फैलाई जा रही अफवाहों पर सफाई देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि दुष्कर्म कभी भी स्वीकार्य नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि उनके वर्षों पुराने बयान को संदर्भ से बाहर काटकर पेश किया गया है, जबकि उनका मूल उद्देश्य पीड़ित के सामाजिक बहिष्कार को रोकना और उसके आत्मसम्मान की रक्षा करना था।
पीड़ित परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कानून मंत्री ने कहा कि सरकार गरिमा की स्मृति में कानूनी सुधारों को गति देने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि कानून मंत्रालय ने बलात्कार और महिला हिंसा से जुड़े कानूनी छिद्रों का अध्ययन पूरा कर लिया है तथा आवश्यक संशोधनों को संसद में पेश करने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है।