नेपाल सरकार के शीर्ष अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद काठमांडू में आयोजित होने वाले एक प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय तिब्बती अध्ययन सम्मेलन को अंतिम समय में रद्द कर दिया गया है। इस फैसले से शैक्षणिक जगत और कूटनीतिक हलकों में हलचल पैदा हो गई है।
'इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर तिब्बतन स्टडीज' के तत्वावधान में यह सम्मेलन २३ से २६ अगस्त तक नेपाल में आयोजित होने वाला था। काठमांडू यूनिवर्सिटी के 'हिमालय सेंटर फॉर एशियन स्टडीज' को इस वैश्विक आयोजन की मेजबानी सौंपी गई थी, जिसमें कई देशों के प्रतिनिधियों को शामिल होना था।
आयोजक केंद्र के प्रोफेसर सागर राज शर्मा ने पुष्टि की कि सरकार के उच्च अधिकारियों द्वारा सम्मेलन न कराने का निर्देश मिलने के बाद उन्होंने इसे रद्द करने का फैसला लिया। हालांकि, प्रशासनिक स्तर पर इस कदम के पीछे का कोई स्पष्ट या लिखित कारण नहीं बताया गया है।
यद्यपि सरकार ने इस विषय पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, लेकिन नेपाल लंबे समय से चीन के साथ मजबूत कूटनीतिक संबंध बनाए हुए है और अपनी धरती पर चीन विरोधी किसी भी गतिविधि की अनुमति नहीं देता है। चीन १९५१ से तिब्बत पर अपना शासन चला रहा है और वहां कम्युनिस्ट पार्टी के नियंत्रण के बाहर किसी भी राजनीतिक या सांस्कृतिक अभिव्यक्ति पर कड़ा अंकुश रखता है।
नेपाल में हजारों तिब्बती शरणार्थी निवास करते हैं और कई शरणार्थी भारत में निर्वासन में रह रहे अपने आध्यात्मिक नेता दलाई लामा तक पहुंचने के लिए नेपाल के रास्ते का उपयोग करते हैं। इसके बावजूद, नेपाल सरकार का रुख स्पष्ट रहा है कि वह अपने क्षेत्र का उपयोग किसी भी मित्र राष्ट्र के खिलाफ गतिविधियों के लिए नहीं होने देगी।
नेपाल में शरणार्थियों द्वारा किए जाने वाले विरोध प्रदर्शनों को पुलिस प्रशासन द्वारा सख्ती से रोका जाता रहा है। यहां तक कि दलाई लामा का वार्षिक जन्मदिवस समारोह भी केवल बौद्ध मठों या शैक्षणिक परिसरों के भीतर ही आयोजित करने की अनुमति है, जिस पर पुलिस कड़ी नजर रखती है। इस सम्मेलन के रद्द होने से एक बार फिर साबित होता है कि क्षेत्रीय भू-राजनीति का असर अकादमिक मंचों पर भी गहरा रहा है।