सुनने में भले ही आकर्षक शब्द लगते हों, लेकिन कार्यान्वयन के दौरान स्वास्थ्य, शिक्षा और बिजली जैसी बुनियादी जरूरतों पर कर लगाने से अर्थमंत्री की स्थानीय अर्थव्यवस्था के प्रति समझ स्पष्ट हो गई। हालांकि बाद में स्वास्थ्य और शिक्षा पर से कर हटा लिया गया, लेकिन बिजली पर मूल्य संवर्धित कर (वैट) को लेकर बहस अब भी गर्म है। देश की आय बढ़ाने के दीर्घकालिक वैकल्पिक रास्ते खोजने के बजाय, पिछले 35 वर्षों की सरकारों द्वारा कर-मुक्त छोड़े गए क्षेत्रों पर निशाना बनाकर कर लगाना एक वरिष्ठ अर्थशास्त्री अर्थमंत्री को शोभा नहीं देता था। व्यावसायिक माहौल में व्यापक सुधार (ease of doing business) की उम्मीद लगाए बैठा व्यापारिक समुदाय 6 महीने बीत जाने के बाद भी निराश है। पुराने काम को ही निरन्तरता दी जाए—मजबूत सरकार है; न दी जाए—तो नए लोग भी पुरानी राह पर ही चल रहे हैं।

लगभग दो-तिहाई बहुमत वाली सरकार 6 महीने बीत जाने के बाद भी अर्थव्यवस्था की तमाम समस्याओं के प्रति उदासीन नजर आ रही है। बल्कि धन की कमी का हवाला देते हुए वह स्वास्थ्य बीमा योजना को सीमित करने की ओर अग्रसर दिखती है, जिससे लाखों नागरिक लाभान्वित हो रहे थे। स्वास्थ्य क्षेत्र में राज्य का ढांचा कमजोर है, यह जानते हुए भी निजी क्षेत्र के स्वास्थ्य संस्थानों से स्वास्थ्य बीमा की सुविधा हटाए जाने से एक बड़ी आबादी का बीमा लाभ से वंचित होना स्वाभाविक है।

विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव का हवाला देकर पिछली सरकारों द्वारा आयात पर प्रतिबंधित की गई मटर, काली मिर्च और छुहारे जैसी दैनिक रसोई की आवश्यक वस्तुएं अब भी प्रतिबंधित हैं। हैरानी की बात यह है कि सरकार द्वारा प्रतिबंधित ये खाद्य सामग्रियां काठमांडू की गलियों की किराना दुकानों में आसानी से उपलब्ध हैं। वर्तमान सरकार पिछली सरकारों के प्रतिबंध के नाम पर चल रही 'सेटिंग' को ही जारी रखे हुए है। नेपाल में उत्पादित न होने वाली काली मिर्च जैसे आवश्यक मसाले पर आयात सीमा शुल्क 50 प्रतिशत से अधिक है। इसी सरकार के कार्यकाल में जूट उद्योग लगभग बर्बादी के कगार पर है। भारत सरकार द्वारा नेपाली जूट उद्योग के प्रति प्रतिकूल नीतियां अपनाए जाने के बावजूद यह सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठा सकी है। एक व्यवसायी ने तो खुले तौर पर कहा— "नेपाल में व्यापार करना पूर्वजन्म के पाप की सजा है।"

पढ़ाई या वैदेशिक रोजगार के लिए विदेश जाने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिसका सीधा असर घरेलू कुल मांग पर पड़ा है। परिणामस्वरूप, घरेलू स्तर पर छोटे और घरेलू उद्योग-धंधे फल-फूल नहीं सके। इसके समाधान के प्रति वर्तमान सरकार पूरी तरह बेखबर नजर आती है।

सफेदपोश अपराध (white-collar crime) को भी पारंपरिक आपराधिक मामलों की तरह मानते हुए "पहले जेल, फिर सुनवाई" जैसा रवैया अपनाए जाने से व्यापारिक आत्मविश्वास में गिरावट महसूस की जा सकती है। आपराधिक कानूनों में समसामयिक सुधार करके सफेदपोश अपराधों के लिए अलग कानून बनाने से इस सरकार को कौन रोक रहा है?

देश की अर्थव्यवस्था में लगभग 15.5 खरब रुपये की तरलता होने और कर्ज की औसत ब्याजदर ऐतिहासिक रूप से कम रहने के बावजूद ऋण निवेश नहीं बढ़ पा रहा है। शेयर बाजार तो मानो पूरी तरह ठप्प पड़ा है। सनक के आधार पर किसी व्यवसायी को गिरफ्तार करना और हिरासत की अवधि बढ़ाते रहना उस व्यवसायी की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय छवि पर क्या प्रभाव डालता है, इसका मूल्यांकन कौन करेगा? अपराध साबित होने पर कार्रवाई होने पर कानून के शासन पर कौन सवाल उठाता है? लेकिन प्रतिशोध से प्रेरित कार्रवाई कानून के शासन का उपहास है और वर्तमान सरकार उसी सिलसिले को जारी रखे हुए स्पष्ट दिखाई देती है। यदि पिछली सरकार ने पूंजीपतियों के पक्षपात को बढ़ावा दिया था, तो उसी के अनुसार जांच करके कार्रवाई के दायरे में लाने के लिए क्या मौजूदा कानून अपर्याप्त हैं? वर्तमान सरकार की कार्यप्रणाली से व्यापारिक जगत अत्यंत आशंकित है और उसने 'देखें और इंतजार करें' की नीति अपना रखी है।

ADVERTISEMENT Max Tiger INLINE