एसबी शाह -  नेपाल की अधिकांश बड़ी नदी प्रणालियाँ सीमापार प्रकृति की हैं। कोशी, गंडकी, कर्णाली और महाकाली जैसी नदियाँ हिमालय से निकलकर नेपाल होकर भारत की ओर बहती हैं। इसलिए नेपाल–भारत संबंधों में जल संसाधन लंबे समय से एक कूटनीतिक और रणनीतिक विषय बनता रहा है।

भारत के साथ कोशी समझौता, गंडक समझौता और महाकाली संधि जैसे औपचारिक दस्तावेज मौजूद हैं। नेपाल सरकार के जल एवं ऊर्जा आयोग सचिवालय ने भी कोशी, गंडक और महाकाली से संबंधित इन समझौतों/संधियों को औपचारिक रूप से दर्ज किया है।

कोशी समझौता सन् १९५४ में हुआ था और बाद में इसमें संशोधन किया गया था। गंडक समझौता सन् १९५९ में हुआ था, जबकि महाकाली संधि सन् १९९६ में हुई थी। इन समझौतों में सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, जलविद्युत तथा नदी के उपयोग जैसे विषय शामिल हैं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत के साथ हुए सभी समझौते नेपाल के लिए विवादरहित हैं। बल्कि कोशी, गंडक और महाकाली समझौतों के लाभ–हानि, पानी के उपयोग, जलभराव, परियोजनाओं के संचालन और नेपाल के हिस्से से जुड़े विषयों पर नेपाल में लंबे समय से बहस होती रही है।

लेकिन कम से कम नदी प्रबंधन के लिए औपचारिक कानूनी संरचना, संयुक्त तंत्र और जलवैज्ञानिक सूचनाओं के आदान-प्रदान का अभ्यास भारत के साथ तुलनात्मक रूप से विकसित है। भारत ने नेपाल से भारत की ओर बहने वाली नदियों में बाढ़ पूर्वानुमान और पूर्वसूचना प्रणाली संचालित होने की बात कही है और दोनों देशों के बीच विभिन्न स्तरों के जल संसाधन संबंधी तंत्रों के माध्यम से चर्चा होती रहती है।

चीन की तरफ स्थिति क्यों अलग है?

नेपाल–चीन संबंधों में सड़क, व्यापार, बुनियादी ढाँचा, ऊर्जा, सीमा प्रबंधन और अन्य विषयों पर कई समझौते और समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर हुए हैं। लेकिन सीमापार नदियों के पानी के बँटवारे, नदियों के बहुउद्देशीय उपयोग, बाँध निर्माण से पड़ने वाले प्रभाव, बाढ़ नियंत्रण और अनिवार्य जलवैज्ञानिक सूचनाओं के आदान-प्रदान को समेटने वाली कोई व्यापक जल संधि नहीं है।

इस विषय को विशेष रूप से संवेदनशील बनाने का कारण यह है कि नेपाल के उत्तरी हिमालय से निकलने वाली कुछ नदियाँ चीन के तिब्बत क्षेत्र से होकर नेपाल में प्रवेश करती हैं। कोशी प्रणाली की मुख्य सहायक नदियाँ तिब्बत से निकलती हैं, जबकि भोटेकोशी/सुनकोशी, त्रिशूली जैसी नदी प्रणालियों का भी तिब्बत के भूभाग से प्रत्यक्ष भौगोलिक संबंध है। कोशी अंततः भारत में गंगा नदी में मिल जाती है।

इस कारण नदी के ऊपरी हिस्सों में होने वाली प्राकृतिक या मानवीय गतिविधियों का असर निचले क्षेत्रों में स्थित नेपाल की बस्तियों, सड़कों, पुलों, जलविद्युत परियोजनाओं और अन्य बुनियादी ढाँचों पर पड़ सकता है।

‘वाटर अटैक’ से क्या समझें?

यहाँ ‘वाटर अटैक’ (जल आक्रमण) शब्द को सैन्य आक्रमण के प्रमाण के रूप में नहीं, बल्कि संभावित जल सुरक्षा जोखिम के रूप में समझना उपयुक्त होगा।

ऊपरी तटीय देश द्वारा बड़ा बाँध बनाने, नदी का बहाव मोड़ने, जलाशय निर्माण करने या किसी संरचना से अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़ने की स्थिति उत्पन्न होने पर निचले तटीय देश पर प्रभाव पड़ सकता है। लेकिन प्राकृतिक बाढ़, ग्लेशियल झील विस्फोट, भूस्खलन या हिमस्खलन को सीधे ‘वाटर अटैक’ नहीं कहा जा सकता।

इसलिए नेपाल के लिए चीन पर बिना प्रमाण ‘जल आक्रमण’ का आरोप लगाने के बजाय जल सुरक्षा के संभावित जोखिमों का कूटनीतिक रूप से संस्थागत प्रबंधन करना अधिक प्रभावी होगा।

रसुवा की हालिया बाढ़ ने दिखाई कमजोरी

यह बहस अब और भी प्रासंगिक हो गई है। सन् २०२६ अगस्त २६ को रसुवा–तिब्बत सीमा क्षेत्र में भोटेकोशी/ल्हेन्दे खोला से संबंधित विनाशकारी बाढ़ आई है। प्रारंभिक विवरणों के अनुसार हिमस्खलन, चट्टान-बर्फ के बड़े भूस्खलन और नदी में अचानक रुकावट जैसे कारणों से पानी का बहाव एकाएक बढ़ा हो सकता है। इस घटना में भारी मानवीय और भौतिक क्षति हुई है।

इस घटना का सबसे गंभीर पहलू केवल बाढ़ आना नहीं है, बल्कि सीमापार क्षेत्र में पानी की स्थिति और संभावित जोखिमों के बारे में तत्काल तथा विश्वसनीय सूचना प्राप्त करने की नेपाल की क्षमता कितनी मजबूत है, यह सवाल भी है।

काठमांडू पोस्ट में आज ही प्रकाशित विवरण में कहा गया है कि नेपाल और चीन के बीच बाढ़ पूर्वसूचना तंत्र बनाने पर चर्चा हुई थी, लेकिन इसे लागू करने वाला औपचारिक समझौता अभी तक नहीं हुआ है। इसी कारण सीमावर्ती क्षेत्रों में ऐसी आपदा आने पर प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के कमजोर होने का जोखिम देखा गया है।

चीन से नेपाल को अब क्या माँग करनी चाहिए?

नेपाल चीन के साथ तत्काल एक ‘नेपाल–चीन सीमापार नदी एवं जल संसाधन सहयोग समझौता’ की पहल कर सकता है। ऐसा समझौता केवल पानी के बँटवारे तक ही सीमित होना आवश्यक नहीं है।

इसमें कम से कम पाँच विषय शामिल होने चाहिए:

१. वास्तविक समय की जलवैज्ञानिक सूचनाओं का आदान-प्रदान: सीमावर्ती नदियों में पानी के स्तर, बहाव, वर्षा, ग्लेशियल झीलों और जलाशयों की स्थिति के बारे में नियमित सूचनाओं का आदान-प्रदान होना चाहिए।

२. बाढ़ पूर्वसूचना प्रणाली: चीन के तिब्बत क्षेत्र में नदियों में असामान्य पानी बढ़ने, ग्लेशियल झील फटने का जोखिम दिखने या बड़े भूस्खलन के कारण नदी अवरुद्ध होने की स्थिति में नेपाल को तुरंत सूचना देने वाला बाध्यकारी तंत्र आवश्यक है।

३. आपातकालीन सूचना आदान-प्रदान की ‘हॉटलाइन’: आपदा के समय कूटनीतिक पत्राचार का इंतजार नहीं किया जाना चाहिए। नेपाल और चीन के संबंधित जल संसाधन और आपदा निकायों के बीच २४ घंटे संचालित होने वाली प्रत्यक्ष संपर्क प्रणाली होनी चाहिए।

४. बड़ी बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं की पूर्वसूचना: सीमापार नदियों पर बड़े बाँध, जलविद्युत परियोजनाएँ, जलाशय या नदी के बहाव को बदलने वाली संरचनाएँ बनाते समय निचले तटीय देश को पर्याप्त पूर्व सूचना देने की व्यवस्था आवश्यक है।

५. संयुक्त वैज्ञानिक अध्ययन: ग्लेशियल झीलों, ग्लेशियरों, भौगोलिक जोखिमों, भूस्खलन और जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में बढ़ने वाले बाढ़ के जोखिमों पर नेपाल और चीन के विशेषज्ञों को संयुक्त अध्ययन करना चाहिए।

भारत के अनुभव से नेपाल क्या सीख सकता है?

भारत के साथ संबंधों में विवादों और असमानता की बहस के बावजूद, नेपाल के पास संयुक्त जल संसाधन तंत्र और बाढ़ पूर्वसूचना प्रणाली का अनुभव है। भारत ने नेपाल से आने वाली नदियों के कारण होने वाली बाढ़ को कम करने के लिए नियमित संवाद और बाढ़ पूर्वानुमान/पूर्वसूचना प्रणाली संचालित होने की बात कही है।

नेपाल चीन से भी वैसा ही तंत्र माँग सकता है—लेकिन अधिक आधुनिक और वैज्ञानिक ढाँचे में।

अर्थात, विषय केवल ‘भारत के साथ संधि हुई, चीन के साथ क्यों नहीं?’ तक सीमित नहीं होना चाहिए। वास्तविक प्रश्न यह है—नेपाल के दोनों पड़ोसियों के साथ सीमापार नदियों से उत्पन्न होने वाले जोखिमों के प्रबंधन के लिए समान रूप से प्रभावी व्यवस्था क्यों न हो?

जल संसाधन अब केवल विकास का विषय नहीं है

नेपाल के लिए नदियाँ केवल जलविद्युत, सिंचाई और पीने के पानी का स्रोत नहीं हैं। यह राष्ट्रीय सुरक्षा और आपदा सुरक्षा का विषय भी है।

हिमालय में जलवायु परिवर्तन के साथ ग्लेशियरों के पिघलने, ग्लेशियल झीलों के बढ़ने के जोखिम, भूस्खलन और अचानक बाढ़ की घटनाएँ बढ़ने की वैज्ञानिक चिंताएँ हैं। सन् २०२६ की हालिया रसुवा बाढ़ ने सीमापार नदियों में होने वाली आपदाओं के जोखिम को पुनः सतह पर ला दिया है।

इसलिए नेपाल को चीन से पानी के बँटवारे की माँग करने के बजाय पहले चरण में ‘पानी की सूचना का आदान-प्रदान’ सुनिश्चित करना चाहिए। पानी कहाँ से आ रहा है, कितना आ रहा है, ऊपरी क्षेत्र में क्या हो रहा है और इससे निचले क्षेत्र में क्या जोखिम पैदा हो सकता है, इसकी समय पर जानकारी मिलना जीवन की रक्षा के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है।

निष्कर्ष

नेपाल–चीन संबंधों को केवल व्यापार, बीआरआई, सीमा नाकों और बुनियादी ढाँचे के नजरिए से देखने का समय अब पर्याप्त नहीं है। हिमालय के पानी और उससे उत्पन्न होने वाले जोखिमों को भी द्विपक्षीय संबंधों का महत्त्वपूर्ण एजेंडा बनाया जाना चाहिए।

भारत के साथ कोशी, गंडक और महाकाली जैसी नदियों पर औपचारिक समझौते होने की तरह ही चीन के साथ भी नदी प्रबंधन पर एक व्यापक कानूनी ढाँचा तैयार करने की पहल नेपाल को करनी चाहिए। इसका उद्देश्य चीन पर आरोप लगाना नहीं है; बल्कि ऊपरी और निचले तटीय देशों के बीच पारदर्शिता, पूर्वसूचना, पारस्परिक सुरक्षा और आपदा न्यूनीकरण सुनिश्चित करना होना चाहिए।

रसुवा की हालिया आपदा ने एक स्पष्ट संदेश दिया है—नेपाल की जल सुरक्षा केवल पानी का उपयोग करने का विषय नहीं है, बल्कि पानी से अचानक उत्पन्न होने वाले जोखिमों से नागरिकों की रक्षा करने का विषय भी है। इसलिए चीन के साथ अब सड़कों और व्यापार के अलावा ‘सीमापार नदी कूटनीति’ (transboundary water diplomacy) को भी उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।