पिछले हफ्ते मैं एक बीमार मित्र से मिलने उनके घर गया। मैंने गेट की घंटी बजाई। बीमार मित्र खुद ही नीचे गेट खोलने आए। "अरे, आप खुद क्यों आए? आज रविवार है, बच्चे घर पर नहीं हैं क्या?" कहते हुए मैं अंदर दाखिल हुआ। उनके थके हुए चेहरे और एक भारी सांस से साफ जाहिर हो रहा था कि मेरे इस सवाल ने उन्हें और अधिक निराश कर दिया था। बच्चे मोबाइल फोन में व्यस्त थे। उन्होंने पास जाकर "देखो अंकल आए हैं" कहकर उन्हें टोका और नमस्ते करवाई। उन्होंने खुद पानी लाकर दिया। "मैडम की भी प्राइवेट नौकरी है, आज छुट्टी नहीं है। क्या कहें, इनकी तो यही आदत है, खुद बीमार हूँ..." कहते-कहते वे रुक गए। उन्हें अपने पेट के अल्सर से ज्यादा चिंता इस बात की थी कि आज के बच्चों में मोबाइल की लत और व्यावहारिक ज्ञान की कमी कहीं अल्सर से बिगड़कर कैंसर जैसी न बन जाए।
इसी तरह सुबह की सैर से लौटते समय मैं घाटी के बाहरी इलाके से आने वाली एक महिला से हरी मकई और हरी सब्जियाँ खरीदा करता था। एक दिन उनका बेटा भी साथ दिखाई दिया। बच्चे का हाथ टूटा हुआ था और उस पर प्लास्टर चढ़ा था। सुबह-सुबह तड़के गाँव से जैविक सब्जियाँ जुटाना, कमरे पर आकर बेटे को स्कूल भेजना, पास के चौराहे पर बैठकर सब्जियाँ बेचना और फिर दोपहर में प्रिंटिंग प्रेस में दिहाड़ी मजदूरी करना उस महिला की दिनचर्या थी। रविवार आते ही उनके सामने सबसे बड़ी चिंता बच्चे की देखभाल की होती थी। कभी वे बच्चे को दुपट्टे से पीठ पर बांधकर काम पर ले जातीं, तो कभी कमरे में दोपहर का खाना और टॉयलेट पॉट रखकर बाहर से ताला लगा देतीं। एक दिन बगल के कमरे वाले पड़ोसी से थोड़ा ध्यान रखने को कहकर गई थीं, लेकिन शाम को लौटने पर बेटे का यह हाल मिला। बच्चा खेलते-खेलते सड़क पर चला गया और बाइक ने टक्कर मार दी।
"हम खुद विदेश में हैं, नेपाल में केवल माता-पिता और बच्चे हैं। हमारे घर की वायरिंग में पता नहीं क्या खराबी है, इलेक्ट्रिशियन बार-बार कहता है कि यह बिगड़ गया, वह बिगड़ गया और लगातार पैसे लेता रहता है यार," विदेश में रहने वाले एक दोस्त ने हाल ही में मुझसे अपना दुख व्यक्त किया था। ये तीनों घटनाएं ऐसी हैं जिन्हें हम आम अभिभावक किसी न किसी रूप में भुगत रहे हैं। विद्यालय में शिक्षक-अभिभावक बैठक के दिन कुछ माता-पिता और शिक्षकों द्वारा सुनाई जाने वाली घटनाएं तो रोंगटे खड़े कर देने वाली होती हैं। आजकल के बच्चों का अत्यधिक उग्र और आक्रामक होकर घटनाओं को अंजाम देना, या पूरी तरह से एकांतप्रिय हो जाना, और डिजिटल प्लेटफॉर्म (Digital Platform) की लत व निर्भरता से उत्पन्न चिंताओं को सुनना बहुत खौफनाक लगता है।
नेपाल में सरकार द्वारा रविवार को भी छुट्टी देने की व्यवस्था लागू होने के बाद अब स्कूली बच्चे रविवार को भी घर पर रहने को मजबूर हैं। दुनिया के अन्य देशों की तुलना में नेपाल सर्वाधिक सार्वजनिक छुट्टियों वाले देशों की सूची में शामिल है। नेपाल जैसे विकासशील देश के लिए सप्ताह में दो दिन की छुट्टी आवश्यक थी या नहीं, इसके प्रभाव और परिणामों पर कोई अनुसंधान किए बिना सरकार ने हड़बड़ी में यह घोषणा कर दी। हालांकि सरकार ने यह कदम तत्कालीन पेट्रोलियम संकट से निपटने के लिए उठाया था, लेकिन अब भी इसे जारी रखा गया है। रविवार की छुट्टी जरूरी थी या नहीं, इस पर बहस करने के बजाय अब यह सोचने का समय है कि विद्यालय इसका सदुपयोग कैसे कर सकते हैं। रविवार को विद्यालय खोलकर जीवनोपयोगी व्यावहारिक कौशल और शिक्षा की कक्षाएं चलाना अधिक उपयुक्त रहेगा।
ऐसा करने पर शिक्षकों की छुट्टियों में समानता का मुद्दा उठ सकता है, लेकिन निजामती संस्थाओं के कर्मचारियों की तुलना में शिक्षकों का पेशा काफी अलग होता है। स्कूलों में मिलने वाली शीतकालीन छुट्टियां, ग्रीष्मकालीन छुट्टियां और परीक्षाओं के बाद दी जाने वाली छुट्टियां शिक्षकों की छुट्टियों में ही समायोजित होती हैं। मूलभूत रूप से अध्यापन एक आदरणीय पेशा है, जिसके श्रम का मूल्य केवल वेतन या सुविधाओं से पूरा नहीं किया जा सकता। विकसित देशों में दो दिन की छुट्टी सभी के लिए लागू होती है—सरकारी से लेकर निजी क्षेत्रों तक—जहाँ लोग पार्ट-टाइम या फुल-टाइम काम के अनुसार अपने घरेलू कामों का प्रबंधन करते हैं। वे बच्चों की देखभाल, मनोविज्ञान और बाल अधिकारों के प्रति काफी जागरूक हैं। हमारे यहाँ दो दिन की छुट्टी सरकारी कार्यालयों और कुछ कॉर्पोरेट दफ्तरों को छोड़कर अधिकांश निजी क्षेत्रों व स्वरोजगारों पर लागू नहीं होती। वर्तमान में हम अपने बच्चों को कक्षा 12 तक केवल पढ़ाई पर जोर देते हैं और उसके बाद सीधे विदेश जाने की होड़ लग जाती है। व्यावहारिक ज्ञान और कौशल के अभाव में विदेशों में उन्हें मिलने वाले दुखों और असफलताओं की दर लगातार बढ़ रही है।
इसके साथ ही, दैनिक जीवन में उपयोगी व्यावहारिक एवं कौशल प्रशिक्षण की आवश्यकता यहाँ भी बहुत अधिक है। कभी-कभी एक साथ इंडक्शन, केतली या प्रेस चलाने पर घर का एमसीबी या फ्यूज डाउन हो जाता है। उसे केवल ऊपर उठाना होता है, जिसे हम पेचकस या प्लास की मदद से एक-दो मिनट में कर सकते हैं। लेकिन तकनीकी ज्ञान की कमी के कारण हम इलेक्ट्रिशियन को बुलाते हैं और पंद्रह सौ रुपये दे देते हैं। इसी तरह, कभी बाथरुम या टॉयलेट जाम होने पर गर्म पानी और कॉस्टिक सोडा डालने से वह अपने आप साफ हो जाता है। लेकिन हम तुरंत प्लंबर बुला लेते हैं और जिस काम में दो-तीन सौ रुपये लगने चाहिए, वहाँ दो-तीन हजार खर्च कर बैठते हैं। उधड़े हुए कपड़ों की सिलाई के लिए महंगे दर्जी के पास जाने के बजाय छोटे से प्रशिक्षण से हम खुद घर पर कपड़े सी सकते हैं। इससे न केवल पैसे की बचत होती है, बल्कि आत्मनिर्भरता भी बढ़ती है। घरेलू प्राथमिक उपचार के ज्ञान के अभाव में कई बड़ी दुर्घटनाएं होते हमने देखा और सुना है। विशेषकर नेपाल जैसे भूकंप और बाढ़-भूस्खलन के उच्च जोखिम वाले देश में प्राथमिक आपदा प्रबंधन और प्रयोगात्मक अभ्यास की सख्त जरूरत है।
इसके तहत कृषि एवं पशुपालन, इलेक्ट्रिशियन एवं प्लंबिंग, ड्राइविंग एवं वाहन मरम्मत, घड़ी-मोबाइल एवं कंप्यूटर मरम्मत, सिलाई-बुनाई, खाना पकाना एवं पोषण (Cooking & Nutrition), संचार एवं सार्वजनिक भाषण (Communication & Public Speaking), नेतृत्व एवं समूह कार्य (Leadership & Teamwork), समय एवं तनाव प्रबंधन (Time & Stress Management) जैसे व्यावहारिक विषयों का प्रशिक्षण दिया जा सकता है। साथ ही, महीने में एक दिन "बैगलेस डे" (Bagless Day) या "बुकफ्री डे" (Bookfree Day) मनाकर विद्यार्थियों को व्यावहारिक कार्य में लगाया जा सकता है और आंतरिक मूल्यांकन में अंक दिए जा सकते हैं। वर्तमान पाठ्यक्रम काफी भारी (Overloaded) है। वर्तमान 1024 कार्य-घंटों में से कुछ समय व्यावहारिक कार्यों के लिए आवंटित कर, नर्सरी से कॉलेज तक के विद्यार्थियों के लिए बोली/व्यवहार, जीवनोपयोगी कौशल और प्रयोगात्मक शिक्षा के तीन चरण बनाकर रविवार की छुट्टी का सदुपयोग किया जाना चाहिए। शिक्षा केवल किताबी ज्ञान नहीं है; यह बच्चों में संस्कार, कौशल और अच्छे आचरण के निर्माण का आधार है। अतः विद्यालय के प्राथमिक स्तर से व्यवहार कुशल कौशल (Life skills), माध्यमिक स्तर पर शिक्षा के साथ कौशल (Skill in Education) और उच्च शिक्षा में वैश्विक नागरिक (Global citizenship) तैयार करने पर ध्यान केंद्रित करते हुए एक अलग व्यावहारिक पाठ्यक्रम तैयार किया जाना चाहिए। — शंकर पांडे 'मुक्ति' (ईमेल: [email protected])