पाकिस्तान की आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक बदहाली और सीमावर्ती तनाव ने दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के पुनर्जीवित होने की बची-खुची संभावनाओं को भी समाप्त कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि इस्लामाबाद के मौजूदा संकटों ने पूरे दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग की गति को गंभीर रूप से बाधित किया है। इस गतिरोध के कारण इस पूरे भू-भाग में बहुपक्षीय विकास और कूटनीतिक साझेदारी का भविष्य एक बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है।

नेपाल, जो सार्क सचिवालय का मेजबान राष्ट्र है, इस संगठन की अकर्मण्यता का सीधा कूटनीतिक नुकसान उठा रहा है। वर्ष 2014 के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते रणनीतिक तनाव के कारण सार्क का कोई भी शिखर सम्मेलन नियमित रूप से आयोजित नहीं हो सका है। सदस्य देशों के बीच बढ़ता अविश्वास अब इस स्तर पर पहुंच गया है कि व्यापार, ऊर्जा, पर्यटन और जन-स्तरीय संबंधों को मजबूत करने के लिए बनाया गया यह साझा मंच पूरी तरह से प्रभावहीन और निष्क्रिय हो चुका है।

इस बदलते परिदृश्य को देखते हुए विदेश नीति के विशेषज्ञों ने नेपाल को अपनी प्राथमिकताओं में रणनीतिक बदलाव करने का सुझाव दिया है। विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि नेपाल को अब सार्क के पुनरुद्धार का इंतजार करने के बजाय अधिक व्यावहारिक और सक्रिय क्षेत्रीय मंचों पर अपनी भूमिका का विस्तार करना चाहिए। काठमांडू के लिए बिम्स्टेक (BIMSTEC) और बंगाल की खाड़ी पर केंद्रित आर्थिक पहल वर्तमान समय में सबसे ठोस और उपयोगी विकल्प साबित हो सकते हैं।

नेपाल ने पहले ही दूरदर्शिता दिखाते हुए भारत, बांग्लादेश और भूटान जैसे पड़ोसी देशों के साथ बिजली व्यापार, सीमा पार ट्रांसमिशन लाइनों और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर व्यावहारिक रूप से काम आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है। रणनीतिक विश्लेषकों का निष्कर्ष है कि दक्षिण एशिया के बदलते शक्ति समीकरणों के बीच नेपाल को अपनी क्षेत्रीय कूटनीतिक भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करना होगा। सार्क के निष्क्रिय रहने के बावजूद, नए उप-क्षेत्रीय अवसरों का लाभ उठाकर ही नेपाल अपने दीर्घकालीन आर्थिक और रणनीतिक हितों को सुरक्षित रख सकता है।