पाल्पा के रिब्दीकोट पहुँचने पर यहाँ की मिट्टी और जलवायु में एक अलग ही सुगंध और उत्साह देखने को मिलता है। जंगली जानवरों द्वारा फसल बर्बाद करने से उजड़े और पलायन से खाली हुए गाँव अब लाल अकबरे मिर्चियों से सजे हुए हैं। इस बदलाव का नाम है— 'अकबरी क्रांति', जिसका नेतृत्व स्थानीय शिक्षक और अग्रणी किसान जनक आचार्य कर रहे हैं।

स्थानीय शिक्षक तथा अगुवा कृषक जनक आचार्य
स्थानीय शिक्षक तथा अगुवा कृषक जनक आचार्य

पूर्वी नेपाल के इलाम से लाए गए बीजों ने पश्चिमी पाल्पा के किसानों की आर्थिक भाग्यरेखा कैसे खींची? नेपाल आज की ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान हमने इसकी आकर्षक कहानी को खंगाला है।

करेंट नूडल्स और गाँव की अर्थव्यवस्था का मजबूत संबंध

इस क्रांति के सफल होने के पीछे एक स्वदेशी ब्रांड का बहुत बड़ा हाथ है। लोकप्रिय 'करेंट नूडल्स' सहित अन्य खाद्य सामग्री बनाने वाली कंपनी 'यशोदा फूड्स' को सालाना लगभग 400 मीट्रिक टन अकबरे मिर्च की आवश्यकता होती है।

  • इसमें से 250 मीट्रिक टन (आधे से अधिक हिस्सा) की आपूर्ति अकेले पाल्पा कर रहा है।

  • शेष मात्रा मकवानपुर, भोजपुर और अर्घाखाँची जैसे पहाड़ी जिलों से पूरी की जाती है।

किसान आचार्य कहते हैं, "अगर यशोदा फूड्स हमारी मिर्च नहीं खरीदता है, तो हमारे पास इसे सड़क पर फेंकने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। करेंट नूडल्स ने हमारा बाज़ार सुनिश्चित कर दिया है, इसी कारण आज गाँव में खुशी छाई हुई है।"

स्थानीय शिक्षक तथा अगुवा कृषक जनक आचार्य
पाल्पाको रिब्दीकोट गाउँपालिकामा व्यावसायिक रूपमा गरिएको अकबरे खुर्सानी खेती।

किसानों का जीवन कैसे बदला? (मुख्य उपलब्धियाँ)

विक्रम संवत 2076 में शुरू हुई यह खेती आज 2 हजार रोपनी से अधिक क्षेत्रफल में फैल चुकी है। इससे आए मुख्य बदलाव इस प्रकार हैं:

  • आर्थिक उछाल: पिछले साल ही रिब्दीकोट के एक संकलन केंद्र के माध्यम से किसानों के हाथ में 4 करोड़ 28 लाख रुपये आए। त्योहार मनाने या घर खर्च चलाने के लिए साहूकारों से भारी ब्याज पर कर्ज लेने की मजबूरी अब इतिहास बन गई है।

  • जानवरों के डर से मुक्त खेती: बंदर, हिरण और जंगली सूअर इसे नहीं खाते हैं, इसलिए किसानों को रात भर जागकर फसलों की रखवाली करने की मजबूरी खत्म हो गई है।

  • कीटनाशक मुक्त (पूर्णतः जैविक): रासायनिक खादों और घातक कीटनाशकों के प्रयोग के बिना ही गाय-भैंस के गोबर की खाद से इस मिर्च का उत्पादन किया जा रहा है।

  • महिला सशक्तिकरण और रोजगार: गाँव की एकल महिलाओं और जिन बहनों के पति विदेश में हैं, वे मिर्ची बेचकर ही लाखों रुपये कमाने लगी हैं। गाँव में ही रोजगार सृजित होने से विदेश जाने का सिलसिला भी रुक गया है।

स्थानीय शिक्षक तथा अगुवा कृषक जनक आचार्य

वीडियो देखना न भूलें!

यह केवल अकबरे मिर्च उगाने की कोई सामान्य कृषि कहानी नहीं है। यह इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि कैसे एक स्वदेशी उद्योग और कॉर्पोरेट बाजार नेपाल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की जीवनशैली को पूरी तरह से बदल सकता है। यदि नेपाल सरकार इसी तरह बाजार सुनिश्चित कर दे, तो युवाओं को खाड़ी देशों में नहीं जाना पड़ेगा।

जनक आचार्य के संघर्ष, सफलता और नेपाल के सभी किसानों में ऊर्जा भरने वाले इस विस्तृत और प्रेरणादायक वीडियो साक्षात्कार को देखने के लिए Nepal Aaaj (नेपाल आज) के आधिकारिक YouTube चैनल पर जाएँ।

 
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