प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने नेपाली राजनीति में एक अनूठी और शक्तिशाली रणनीति अपनाई है— 'मौन'। ज्यादा बोलने से विवादों में फंसने के डर से उन्होंने न केवल कम बोलने की नीति अपनाई है, बल्कि 'दुनिया के सबसे कम बोलने वाले प्रधानमंत्री' के रूप में 'गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड' बनाने की तैयारी में भी जुट गए हैं।

यह रणनीति पार्टी अध्यक्ष रवि लामिछाने के ठीक विपरीत है, जिन्हें सबसे ज्यादा बोलकर विश्व रिकॉर्ड बनाने में माहिर माना जाता है।

संसद में 'आवाज' की तलाश

30 वैशाख 2083 का वह दिन 13 मई 2026 (30 वैशाख 2083) को नेपाली संसद में एक अभूतपूर्व दृश्य देखा गया। प्रधानमंत्री को सुनने और देखने को न मिलने के गुस्से में विपक्षी दलों ने सदन की कार्यवाही बाधित कर दी। आमतौर पर नेताओं के बोलने के विरोध में सदन रुकता है, लेकिन यहाँ 'प्रधानमंत्री क्यों नहीं बोलते?' की मांग को लेकर हंगामा हुआ।

सचिवालय में 'नो मोबाइल' पॉलिसी और कडा अनुशासन प्रधानमंत्री की कार्यशैली जितनी रहस्यमयी है, उनका सचिवालय उतना ही अनुशासित है। सूचनाएं बाहर न जाएं और कर्मचारी बाहरी दबाव से मुक्त रहें, इसके लिए सचिवालय में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है।

छूट पाने वाले सीमित पात्र

केवल तीन लोग— प्रेस सलाहकार दीपा दाहाल, राजनीतिक सलाहकार असीम शाह और मुख्य सलाहकार कुमार बेन को ही मोबाइल ले जाने की अनुमति है।

दिनचर्या

सुबह 9 से शाम 5 बजे तक राज्य संचालन में व्यस्त रहने वाले बालेन, शाम होने के बाद अपने परिवार और बेटी के साथ समय बिताना पसंद करते हैं।

मध्यस्थों के जरिए संचार

एक अलग शैली हालांकि संचार कौशल स्वयं प्रदर्शित करने वाली कला है, फिर भी बालेन ने 'मध्यस्थों' के माध्यम से बात करने की शैली अपनाई है। वे सीधे संवाद करने के बजाय अपने विश्वसनीय सलाहकारों को आगे करते हैं, जिससे उनका रहस्य और प्रभाव और भी बढ़ता हुआ दिखाई देता है।

निष्कर्ष

लोकतंत्र में जनता के प्रति जवाबदेह होने की आवश्यकता के बावजूद, बालेन का यह 'मौन व्रत' उनके लिए शक्ति और विपक्ष के लिए सिरदर्द का विषय बन गया है। बिना बोले काम करने की उनकी यह सेलिब्रिटी शैली नेपाली राजनीति में एक नया विमर्श पैदा कर रही है।