'वैकल्पिक राजनीति' के नारे के साथ उभरी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) के भीतर शीर्ष नेतृत्व स्तर का आंतरिक विवाद सतह पर आ गया है। अध्यक्ष रवि लामिछाने और वरिष्ठ नेता/प्रधानमंत्री बालेंद्र (बालेन) शाह समूह के बीच शक्ति संतुलन और पदों के बंटवारे पर सहमति न बनने के कारण पार्टी के संगठनात्मक पुनर्गठन और सरकार के मंत्रिमंडल फेरबदल, दोनों प्रक्रियाएं ठप हो गई हैं।

पार्टी महाधिवेशन से पहले हुए सात-सूत्रीय समझौते और उसके बाद की समझ के अनुसार संगठन और सरकार में दोनों पक्षों का समान अस्तित्व बनाए रखने की बात कही गई थी, लेकिन पदों के बंटवारे के तौर-तरीकों पर सहमति नहीं बन पाई है। बालेन पक्ष नामांकित होने वाले पदाधिकारियों और केंद्रीय सदस्यों में 50/50 प्रतिशत की बराबर हिस्सेदारी की मांग कर रहा है। वहीं अध्यक्ष रवि पक्ष अध्यक्ष के विशेषाधिकार का तर्क देते हुए 60/40 के अनुपात पर अड़ा हुआ है। महाधिवेशन से निर्वाचित अधिकांश सदस्य 'खस-आर्य' क्लस्टर से होने के कारण समावेशी कोटा (मधेसी, दलित, जनजाति, थारू, मुस्लिम और महिलाएं) का संतुलन बनाने के लिए 60 प्रतिशत अधिकार अध्यक्ष के पास ही होने का दावा लामिछाने पक्ष का है। इसी खींचतान के कारण दोनों शीर्ष नेताओं के बीच दूरी और अविश्वास चरम पर पहुंच गया है।

बंटवारे की इस उलझन के कारण पार्टी के महत्वपूर्ण अंग महीनों से अनिश्चित बने हुए हैं। विधान के अनुसार 158 सदस्यीय केंद्रीय समिति में चितवन महाधिवेशन से केवल 7 पदाधिकारी और 99 केंद्रीय सदस्य ही निर्वाचित हुए थे। बाकी बचे 51 केंद्रीय सदस्यों और 11/12 पदाधिकारियों (उपाध्यक्ष, महामंत्री, सह-महामंत्री, प्रवक्ता और कोषाध्यक्ष आदि) की नामांकन प्रक्रिया रवि-बालेन की असहमति के कारण अटकी हुई है। कानूनी रूप से 33 प्रतिशत महिलाओं सहित समावेशी संतुलन बनाए रखने के लिए नामांकन अनिवार्य होने के बावजूद, किस कोटे में किसे लाया जाए, इस विवाद ने पार्टी के नए सचिवालय और केंद्रीय समिति के गठन को प्रभावित किया है।

पार्टी के भीतर इस संगठनात्मक अनिश्चितता का सीधा असर सरकार के संचालन और मंत्रिमंडल फेरबदल पर भी पड़ा है। मंत्रियों के कार्य-प्रदर्शन की समीक्षा कर मंत्रिमंडल के पुनर्गठन की तैयारी शुरू होने के बावजूद दोनों पक्षों द्वारा अपने-अपने करीबी सांसदों को मंत्री बनाने या बनाए रखने की खींचतान चल रही है। किस मंत्रालय को किसे दिया जाए, इस पर आंतरिक सहमति न बनने से सरकार अनिर्णय की बंदी बन गई है। इसके कारण मंत्रालयी कामकाज, सुशासन के एजेंडे और महत्वपूर्ण प्रशासनिक नियुक्तियां अधर में लटक गई हैं। नई राजनीतिक संस्कृति का दावा करने वाली रास्वपा भी आखिरकार पुराने दलों की तरह ही बंटवारे और गुटबाजी के जाल में फंस गई है, ऐसा राजनीतिक विश्लेषण होने लगा है।

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