काठमांडू। नेपाली राजनीति की पारंपरिक धुरी को हिलाकर 'वैकल्पिक शक्ति' के रूप में उभरी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) इस समय अपने पहले ऐतिहासिक महाधिवेशन के मुहाने पर खड़ी है। चुनाव के दौरान "जानने वाले को चुनने" (योग्य को चुनने) और "सुसंस्कृत राजनीति" का नैरेटिव बनाकर जागरूक मतदाताओं का दिल जीतने वाली रास्वपा, महाधिवेशन तक आते-आते पुराने दलों के ढर्रे को कॉपी-पेस्ट करने और आंतरिक शक्ति संतुलन के चक्रव्यूह में फंसी नजर आ रही है।
बाहर से देखने पर लोकतांत्रिक अभ्यास का मुखौटा ओढ़े रास्वपा के भीतर ही भीतर नए 'सिंडिकेट' और गुटबाजी के बीज बोए जा चुके हैं।
निर्विकल्प रवि: क्या यह 'प्रचंडपथ' की नकल है?
इस महाधिवेशन का सबसे दिलचस्प और आलोचनात्मक पहलू सभापति पद पर रवि लामिछाने की "निर्विकल्प" उपस्थिति है। सुसंस्कृत और विधि की बात करने वाली पार्टी में सभापति पद के लिए किसी अन्य नेता की आकांक्षा या उम्मीदवारी का न होना रास्वपा के आंतरिक लोकतंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
आलोचनात्मक विश्लेषण: यह शैली हूबहू माओवादी पृष्ठभूमि के शीर्ष नेता पुष्पकमल दाहाल 'प्रचंड' की शासकीय शैली से मेल खाती है, जहां दशकों तक नेतृत्व परिवर्तन की बहस तो दूर, नेतृत्व का विकल्प खोजने की हिम्मत भी कोई नहीं करता। रवि लामिछाने की इस 'निरंकुश लोकतांत्रिक' छवि ने इस आशंका को बल दिया है कि रास्वपा कहीं 'वैकल्पिक दल' से सिकुड़कर सिर्फ 'रवि क्लब' बनकर तो नहीं रह गई है।
'रवि क्लब' वर्सेज 'बालेन गुट': आंतरिक लोकतंत्र की सर्विसिंग या पदों का बंदरबांट?
रास्वपा के भीतर अब यह धारणा स्थापित होने लगी है कि जैसे कहा जाता है कि थोड़ा-बहुत भ्रष्टाचार अर्थव्यवस्था को गति देता है, वैसे ही थोड़ी-बहुत गुटबाजी पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र की सर्विसिंग करती है। पार्टी के भीतर स्पष्ट रूप से दो धड़े दिखाई दे रहे हैं—रवि क्लब और बालेन गुट।
वरिष्ठ नेता बालेंद्र शाह (बालेन) के पास फिलहाल सरकार और कार्यकारी भूमिका की व्यस्तताओं के कारण सभापति पद पर चुनाव लड़ने का समय और माहौल तो नहीं है, लेकिन पार्टी के पावर स्ट्रक्चर पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने के लिए वे और उनके समर्थक बेहद रणनीतिक रूप से आगे बढ़े हैं। बालेन के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने से पहले तक रास्वपा रवि के 'निजी क्लब' जैसी थी, जहां केवल उनके करीबियों का बोलबाला था। लेकिन अब, सत्ता का समीकरण बदल चुका है।
भीतरी समझौता: इस तरह हो रहा है पदों का बंटवारा
रास्वपा सूत्रों के मुताबिक, पार्टी को फूट से बचाने और दोनों धड़ों को साधने के लिए महाधिवेशन से पहले ही 'पावर शेयरिंग' का खाका तैयार कर लिया गया है। जिसके तहत बालेन गुट को पार्टी के महत्वपूर्ण संगठनात्मक और नीतिगत पद मिलना तय हुआ है:
सुसंस्कृत बनने की कसौटी पर रास्वपा
पुरानी प्रवृत्तियों को गाली देकर जिस पार्टी का जन्म हुआ, उसी पार्टी द्वारा अपने पहले महाधिवेशन में पदों की 'कमरा बंद बंदरबांट' और 'मनोनयन की राजनीति' करना अपने आप में विरोधाभासी है। यदि रास्वपा को वास्तव में खुद को 'योग्य, सुसंस्कृत और लोकतांत्रिक' साबित करना है, तो उसे इस कोठे-बंटवारे की राजनीति और 'रवि क्लब' के खुमार से ऊपर उठना ही होगा। अन्यथा, नई बोतल में पुरानी शराब की तरह, रास्वपा भी एक और पारंपरिक दल का नया संस्करण मात्र साबित होगी।