विगत में नेपाली राजनयिकों और विदेशी सुरक्षा मिशनों में जाने वाले व्यक्तियों के बारे में प्रायः यह धारणा बनी हुई थी कि वे केवल नौकरी करने, भ्रष्टाचार करने या आकर्षक आर्थिक लाभ लेने ही जाते हैं। मिशन में जाने, सूडान घोटाले जैसे कांड करके मोटी रकम कमाकर लाने, लेकिन देश और जनता के लिए खास काम न करने की प्रवृत्ति हावी थी। हालांकि, बालेन सरकार बनने के बाद भारत स्थित नेपाली दूतावास कूटनीतिक मामलों पर 'लाउडस्पीकर' की तरह बोलने लगा है। अतीत में हमेशा चुपचाप और रक्षात्मक रहने वाले राजनयिक अचानक आक्रामक और सक्रिय होने लगे हैं। लेकिन, यहाँ एक गंभीर कूटनीतिक विडंबना भी है– स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा ही 'नेपाल ने भी भारत की जमीन पर कब्जा किया हो सकता है' आशय का सार्वजनिक बयान देने के बाद इन सक्रिय कर्मचारियों का क्या वश चले? सुस्ता जैसी विवादित भूमि में दोनों तरफ से अतिक्रमण होने की संभावना के बीच नेपाल ने अभी काफी सख्त पत्र तो लिखा है, लेकिन उसी पत्र के जवाब में भारतीय पक्ष ने 'तुमने हमारी जो जमीन दबाई है उसका विवरण दो और खाली करो' कहा तो नेपाल क्या जवाब देगा? यह सवाल इस समय कूटनीतिक हलकों में बेहद पेचीदा और व्यंग्यात्मक बन गया है।
इसी पेचीदा कूटनीतिक पृष्ठभूमि में, नई दिल्ली स्थित नेपाली दूतावास ने पश्चिम नवलपरासी के सुस्ता में स्थित नेपाल-भारत सीमा विवाद और वहाँ हाल ही में घटी गंभीर घटना को लेकर भारत के विदेश मंत्रालय के समक्ष औपचारिक रूप से कड़ी आपत्ति जताई है। रविवार को ही सुस्ता के विवादित क्षेत्र के आसपास सादे कपड़ों में आए भारतीय सुरक्षाकर्मियों ने नारायणी नदी की बाढ़ और कटाव से गाँव को बचाने के लिए स्थानीय निवासियों द्वारा बनाए गए मिट्टी के कच्चे बाँध को खोदकर तोड़ दिया था। बाढ़ से जान बचाने के स्थानीय लोगों के इस मानवीय प्रयास को नष्ट किए जाने के बाद दोनों पक्षों के बीच तनाव पैदा हो गया था, जिसे बाद में नेपाल के सशस्त्र प्रहरी बल और भारत के सीमा सुरक्षा बल ने नियंत्रण में लिया।
घटना होते ही नेपाली अधिकारियों ने बाढ़ से बचाव के मानवीय प्रयास में रुकावट को गलत बताते हुए कूटनीतिक नोट सौंपा। लेकिन इसके जवाब में भारतीय पक्ष ने सुस्ता क्षेत्र को 'विवादित क्षेत्र' बताते हुए और दोनों देशों के बीच 'यथास्थिति' बनाए रखने की सहमति का हवाला देते हुए कोई भी नया निर्माण न करने का पुराना दावा दोहराया है। सुस्ता नेपाल और भारत के बीच एक लंबा सीमा विवादित क्षेत्र है। वर्ष 2014 में दोनों देशों ने इन विवादों को विदेश सचिव स्तर के तंत्र से सुलझाने पर सहमति जताई थी, लेकिन पिछले 12 वर्षों से इस तंत्र की बैठक ही नहीं हो सकी है।
सुस्ता के लगभग 24 किलोमीटर सीमा क्षेत्र में कोई सीमा स्तंभ न होने से विवाद और भड़क गया है। यहाँ सेमल के पेड़ और नदी को ही सीमा माना जाता रहा है। वर्ष 1988 में नारायणी नदी को निश्चित सीमा सिद्धांत के अनुसार सीमा मानने पर सहमति बनी थी। लेकिन दशकों से नारायणी नदी द्वारा लगातार अपना मार्ग बदलने के कारण जमीन के स्वामित्व को लेकर बार-बार विवाद होता रहा है। नदी का बहाव बदलने के साथ दोनों तरफ से सीमा अतिक्रमण होने की जटिल स्थिति यहाँ मौजूद है।
लगभग दो महीने पहले भी बाढ़ नियंत्रण के लिए बनाए जा रहे 132 मीटर पक्के तटबंध के निर्माण कार्य को भारतीय सीमा सुरक्षा बल ने रोक दिया था। पक्का तटबंध न बन पाने और अब कच्चा बाँध भी तोड़ दिए जाने से नारायणी नदी की बाढ़ सीधे आबादी में घुसने का जोखिम अत्यधिक बढ़ गया है। यहाँ की मुख्य समस्या और चिंता का विषय केवल यह नहीं है कि किसकी कितनी जमीन दबाई गई; 'विवादित भूमि' के नाम पर वहाँ रहने वाले नागरिकों की जान और आजीविका के साथ हो रहा खिलवाड़ है। चरम मौसमी स्थितियों और बाढ़ के समय यहाँ के निवासियों का जीवन अत्यंत कष्टदायक और जोखिमपूर्ण हो जाता है।
वर्षों की इस अनिश्चितता और जोखिम से तंग आकर दो हफ्ते पहले ही सुस्ता के निवासी काठमांडू के माइतीघर मंडला में आकर प्रदर्शन करते हुए सरकार का ध्यान आकर्षित कर चुके हैं। एक तरफ स्थानीय निवासी चरम मौसम में अपना आशियाना और जान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व की हल्की टिप्पणी कूटनीतिक रुख का मजाक उड़ाती प्रतीत होती है। विवादित भूमि का तकनीकी समाधान तलाशने की प्रक्रिया अपनी जगह होगी, लेकिन नागरिकों की जान और आजीविका से जुड़ी इस गंभीर मानवीय समस्या का दोनों देशों को कूटनीतिक बातचीत के माध्यम से जल्द से जल्द समाधान करने की सख्त जरूरत है।