दीपक कुमार त्यागी - अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक
'त्यागी समाज का वोटर लंबें समय से भाजपा को वोट करता आ रहा है, जिसके चलते उस पर भाजपा का कट्टर वोटर होने का ठप्पा लगा हुआ है। भाजपा से भावनात्मक रूप से लगाव होने का यह आलम है कि पार्टी चाहे राजनीतिक रूप से त्यागी समाज की कितनी भी उपेक्षा करती रहे, लेकिन फिर भी त्यागी समाज के वोटर 'राष्ट्र प्रथम' और 'हिंदुत्व' के भाव से ओतप्रोत होने के चलते ही बड़ी संख्या में भाजपा को वोट करते हैं। हालांकि निस्वार्थ निष्ठा के इस भाव का भाजपा के कुछ लोगों के द्वारा दुरुपयोग किया जा रहा है, त्यागी समाज के लोगों की निरंतर अनदेखी किया जा रही है, सत्ता व संगठन तक में भी उनको मान-सम्मान व तय हक नहीं दिया जा रहा है। राष्ट्र प्रथम व हिंदुत्व के भाव से ओतप्रोत जिस त्यागी समाज को भाजपा का कट्टर समर्थक होने के नाते पार्टी की तरफ़ से बड़ा ईनाम मिलना चाहिए था, ना जाने क्यों आज उसी भाजपा के कुछ लोग त्यागी समाज के राजनीतिक अस्तित्व को कम करने पर आमादा हैं। इस स्थिति से बुद्धिजीवी माने जाने वाले त्यागी समाज के बहुत सारे लोग अब अपने आपको उपेक्षित व ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
राष्ट्र प्रथम के भाव और देश में हिंदुत्व की सुरक्षा की खातिर त्यागी समाज के भाजपा की राजनीति में सक्रिय बहुत सारे राजनेताओं को अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का निरंतर बलिदान देना पड़ रहा है। क्योंकि भाजपा की केंद्र व प्रदेशों की सत्ता में त्यागी समाज के लोगों की बिल्कुल भी हिस्सेदारी नहीं है, देश में त्यागी समाज का एक भी लोकसभा व राज्यसभा सांसद नहीं है। उत्तर प्रदेश में एक विधायक अजीत पाल त्यागी व एक विधानपरिषद सदस्य अश्विनी त्यागी हैं, उनको भी मंत्री तक नहीं बनाया गया। वहीं पूर्व मंत्री बालेश्वर त्यागी जैसे विद्वान राजनेता का पार्टी कोई उपयोग नहीं कर रही है। पूर्व विधायक सत्यवीर त्यागी, संघ व भाजपा को अपने जीवन का लंबा समय देने वाले डॉक्टर विरेश्वर त्यागी व पूर्व पार्षद राजेंद्र त्यागी को कोई महत्वपूर्ण दायित्व नहीं दिया जा रहा है। इसके अलावा पार्टी में त्यागी समाज के एक से एक योग्य हर आयु वर्ग के नेता हैं, लेकिन अधिकतर को कहीं ना कहीं सिर्फ इंतजामी बना के छोड़ दिया है, बेचारे सफलता हासिल करने की उम्मीद में संगठन के द्वारा मिलने वाले कामकाज में पूरी निष्ठा से लगें रहते हैं। वहीं संगठन में त्यागी समाज के लोगों को पन्ना प्रमुख, मंडल अध्यक्ष, महानगर व जिला कार्यकारिणी आदि तक ही सीमित करके रख दिया गया है। हालांकि उत्तर प्रदेश में अपने निजी संबंधों के दम पर बसंत त्यागी एकबार फिर से प्रदेश कार्यकारिणी में मंत्री बनने में सफल हो गए हैं, वह बसंत त्यागी की व्यक्तिगत संबंध व खूबियों के दम पर ही संभव हुआ है, वैसे राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि बसंत त्यागी को क्षेत्रीय अध्यक्ष बनाकर के पार्टी त्यागी समाज के लोगों की नाराज़गी को दूर करने का कार्य रही है, लेकिन अफसोस पार्टी ने क्षेत्रीय अध्यक्ष तो दूर की बात बसंत त्यागी का प्रमोशन तक भी नहीं किया, जो स्थिति त्यागी समाज के राजनीतिक वजूद के लिए उचित नहीं है। वैसे त्यागी समाज के लोग निष्पक्ष रूप से आंकलन करें तो भाजपा से उनका प्रेम राष्ट्र प्रथम के भाव व देश में हिंदुत्व की सुरक्षा की खातिर केवल एकतरफा ही नज़र आता है। क्योंकि अगर प्रेम की यह स्थिति दोनों की तरफ़ से होती तो सत्ता व संगठन में त्यागी समाज के एक से एक प्रकांड विद्वान व योग्य लोगों की इस तरह से अनदेखी नहीं होती। वैसे निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो राष्ट्र भक्ति व हिंदुत्व की सुरक्षा की खातिर भाजपा से प्रेम करने की और समर्थन करने की इस मजबूरी का पूरे त्यागी समाज को जबरदस्त नुक़सान उठाना पड़ रहा है, कुछ दशकों से राजनीतिक रूप से तो त्यागी समाज के लोगों को भारी नुक़सान उठाना पड़ रहा है, वह राजनीतिक रूप से एक तरह से हाशिए पर चले गए हैं। वहीं शासन-प्रशासन के लोगों के द्वारा भी त्यागी समाज की उपेक्षा की जा रही है, अपने जरा-जरा से काम के लिए भी उन्हें ऐड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता है, वहीं अगर त्यागी समाज के किसी व्यक्ति के साथ कोई अन्याय पूर्ण घटना घटित हो जाये तो उनको न्याय दिलाने के लिए भी त्यागी समाज के लोगों को सड़क पर उतरना पड़ता है, अभी हाल की ही बात करें तो गाजियाबाद जनपद के बसंतपुर सैथली निवासी देश की अनमोल धरोहर पैरा खिलाड़ी चिराग त्यागी जघन्य हत्याकांड इसकी एक बानगी है।
वैसे बुद्धिजीवी माने जाने वाले त्यागी समाज के लोगों को भी आत्ममंथन करना चाहिए कि जो त्यागी समाज कभी पूरी ठसक व मान-सम्मान के साथ महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी व यहां तक की अटल बिहारी वाजपेयी तक के भी साथ बराबर में बैठकर के देशवासियों से जुड़े हुए अहम फैसला करता था, पिछले कुछ दशकों से जिला, प्रदेश व देश स्तर तक के भी निर्णायक मंडलों से बाहर क्यों है। वैसे भी जातिवाद के इस जहरीले दौर में त्यागी समाज के लिए राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए स्थिति विचारणीय हो गयी है। क्योंकि सत्ता पक्ष भाजपा को तो त्यागी समाज पर यह पूरी तरह से विश्वास है कि त्यागी समाज के लोगों का राष्ट्र प्रथम का भाव व हिंदुत्व के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण अब भाजपा के अलावा किसी अन्य दल को वोट नहीं करेंगे और लाख तरह की उपेक्षाओं को सहने के बाद भी त्यागी समाज का वोटर भाजपा से छिटक कर दूर कहीं नहीं जाएगा। जिस विश्वास के चलते ही बड़ी ही चतुराई के साथ त्यागी समाज के राजनेताओं को भाजपा के राष्ट्रीय व प्रदेश संगठन, केंद्र व प्रदेश के मंत्रीमंडल व टिकट बंटवारे आदि में द्वारा दरकिनार कर दिया जाता है। वहीं दूसरे राजनीतिक दलों में अपनी पैठ बनाने में लगे हुए त्यागी समाज के राजनेताओं की समस्या यह है कि उस पार्टी का शीर्ष नेतृत्व यह कहकर के उन लोगों की उपेक्षा कर देता है कि इन लोगों के पास अपने समाज की दो वोट तक भी नहीं हैं, इसलिए त्यागी समाज के लोगों को क्यों मान-सम्मान, पद व टिकट आदि दें। हालांकि अगर किसी अन्य राजनीतिक दल से ग़लती से कभी किसी त्यागी समाज के व्यक्ति को टिकट मिल भी गया है तो त्यागी समाज के लोगों ने बिना किसी भी तरह के दवाब व जातिवाद को माने बिना राष्ट्र प्रथम व हिंदुत्व की रक्षा के भाव को सर्वोपरि मानते हुए अपने त्यागी समाज के प्रत्याशी को वोट ना देकर भाजपा प्रत्याशी को ही वोट देने का कार्य किया है। लेकिन अफसोस फिर भी त्यागी समाज को सत्ता व संगठन में भागीदारी से दूर ही रखा जा रहा है।
हालांकि जिस तरह से वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में जाति के बंधनों को तोड़कर के सनातनियों ने देश में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में मोदी की सरकार बनवायी थी, उस समय लगने लगा था कि देश से जातिगत राजनीति का कम से कम अब तो अंत हो ही जायेगा। राजनीति में भी जाति के आधार की जगह अच्छे लोगों को आगे आने का अवसर मिलेगा, लेकिन अफसोस देश में ऐसा नहीं हुआ, हालांकि हिन्दुओं ने दो बार कास्ट बैरियर को तोड़कर के सभी सनातनियों को एकजुट करते हुए केंद्र में भाजपा की सरकार प्रचंड बहुमत से बनवायी। लेकिन तीसरी बार सरकार बनाने के तिकड़म में सत्ता पक्ष ने विपक्ष के जातिवाद के अनैतिक दवाब में आकर के फिर से देश में जातिवाद के ज़हर को जिंदा कर लिया। अब कुछ क्षणिक स्वार्थी बेहद ही चतुर चालाक राजनेताओं की कृपा से पूरे देश में पुनः जातिवाद का जबरदस्त तांडव मचा हुआ है, जो स्थिति राष्ट्र व हिंदुत्व के लिए उचित नहीं है। ऐसी चिंताजनक स्थिति में राष्ट्र प्रथम व हिंदुत्व के भाव से ओतप्रोत त्यागी समाज के लोगों का भी कम से कम यह फ़र्ज़ तो बनता है ही कि वह राष्ट्र व हिंदुत्व हितों की सुरक्षा करते हुए अपना व अपने बच्चों के हक की भी सुरक्षा का ध्यान रखें। लेकिन स्थिति समझ से परे है कि ना जाने क्यों त्यागी समाज के भाजपा के कट्टर वोटर होने बाद भी सत्ता पक्ष के द्वारा त्यागी समाज की निरंतर सत्ता व संगठन की भागीदारी में उपेक्षा की जा रही है। इस स्थिति पर त्यागी समाज के कुछ बुद्धिजीवी लोगों का आरोप है कि अब त्यागी समाज की भाजपा में उपेक्षा वाली स्थिति सामान्य नज़र नहीं आती है, बल्कि सत्ता पक्ष में कोई तो ऐसा व्यक्ति बैठा हुआ है जो त्यागी समाज के लोगों को केवल भाजपा के वोटर के रूप में तो पसंद करता है, लेकिन त्यागी समाज के लोगों को सत्ता व संगठन में उनकी भागीदारी के तय हक व मान-सम्मान देते समय त्यागी समाज के लोगों को पसंद नहीं करता है। त्यागी समाज के लोगों का अपना नाम ना छापने की शर्त पर आरोप है कि कोई तो ऐसा व्यक्ति है, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को त्यागी समाज के वारे में जबरदस्त ढंग से गुमराह करने का कार्य लगातार कर रहा है। इसलिए अब समय आ गया है जब बुद्धिजीवी माने जाने वाले त्यागी समाज के लोगों के लिए राजनीतिक जमीन बचाने के राजनीतिक दलों से अपना मान-सम्मान व तय हक पाने के लिए आत्ममंथन करना होगा और पूरी एकजुटता के साथ अपना हक व मान-सम्मान मांगना होगा, तब ही आने वाले समय में केंद्र व प्रदेशों की राजनीति में त्यागी समाज के नेताओं का राजनीतिक अस्तित्व सुरक्षित रह सकता है।
वैसे भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के शीर्ष नीति-निर्माताओं, कर्ताधर्ताओं व हाईकमान को भी सोचना चाहिए कि देश की जंगें आज़ादी से लेकर के आज राष्ट्र के नवनिर्माण के दौर तक में भी त्यागी समाज ने हमेशा अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को त्याग करके देश व हिन्दू हित में कार्य किया है। उसी पूरे जोशो-खरोश के साथ दशकों से त्यागी समाज भाजपा के साथ खड़ा हुआ है, लेकिन लगता है कि भाजपा के एकतरफा समर्थन को कुछ राजनेता त्यागी समाज की मजबूरी मानकर के उसका ग़लत लाभ उठा रहे हैं, कुछ लोग त्यागी समाज के भावनात्मक व वैचारिक रूप से भाजपा के साथ जुड़ाव का ग़लत लाभ उठा रहे हैं। वैसे आज के दौर के हिसाब से देखा जाये तो त्यागी समाज की इस स्थिति के लिए वह स्वयं भी काफी हद तक जिम्मेदार है, क्योंकि भाजपा का कट्टर समर्थक होने के बावजूद भी राजनीतिक उपेक्षा का सबसे बड़ा कारण त्यागी समाज के लोगों के द्वारा संगठित होकर के कभी भी भाजपा के नेतृत्व से राजनीतिक सौदेबाजी ना करने वाला भाव रहा है। वहीं दूसरे दलों में त्यागी समाज को पारंपरिक रूप से भाजपा का कट्टर और एकमुश्त मतदाता मान कर के उसकी उपेक्षा कर दी जाती है। इस स्थिति के चलते ही देश में आज त्यागी समाज का राजनीतिक अस्तित्व खतरें में है, कम से कम त्यागी समाज के प्रतिष्ठित लोगों को अब तो समझना होगा कि भाई कलयुग में बिना रोएं तो कुछ मां तक भी अपने बच्चों को दूध पिलाने के लिए तैयार नहीं है, फिर यहां तो सत्ता के मद में चूर ताकतवर लोगों से संगठन व सत्ता में समाज की भागीदारी लेने की बात है, इसलिए त्यागी समाज के ताकतवर मठाधीशों को अपना अहंकार त्याग करके एकजुट होकर के राजनीतिक नेतृत्व को मजबूती देनी होगी, तब ही देश में जातिवाद के इस भयंकर दौर में हम लोग अपना व अपने बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा करते हुए, राष्ट्र प्रथम व हिंदुत्व के भाव से ओतप्रोत रहकर राष्ट्र व हिन्दू हित के कार्य कर सकते हैं।