राजविराज। राजनीति को अक्सर भाषणों, शक्ति प्रदर्शन और प्रचार के बड़े-बड़े दृश्यों से याद किया जाता है। लेकिन नेपाल की ग्रामीण राजनीति में ऐसे पात्र भी हैं, जिनकी राजनीतिक पहचान भाषणों से ज्यादा उनके द्वारा पीछे छोड़े गए भौतिक ढांचों और जनता से जुड़े प्रयासों से बनी है।
सप्तरी क्षेत्र नंबर-3 (ख) के पूर्व प्रांतीय सभा सदस्य विदेश्वर प्रसाद यादव 'विक्की' ऐसा ही एक नाम हैं।
2074 के चुनाव में तत्कालीन राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल से प्रांतीय सभा सदस्य के रूप में निर्वाचित यादव ने 10,328 मत प्राप्त किए थे। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी नेपाली कांग्रेस के भगवती प्रसाद यादव को 6,212 मत मिले थे।
प्रांतीय सभा सदस्य बनने के बाद विक्की यादव की राजनीतिक प्राथमिकताएं सत्ता और पद के बजाय अपने निर्वाचन क्षेत्र के विकास के मुद्दों पर केंद्रित रहीं, ऐसा उनके समर्थकों का दावा है। सीमावर्ती और ग्रामीण इलाकों में राज्य की पहुंच कमजोर होने की बात कहते हुए उन्होंने सड़कों, पेयजल, सामुदायिक भवनों, धार्मिक स्थलों और अन्य लघु-मध्यम बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए निरंतर प्रयास किए।
उनकी राजनीतिक शैली को समझने का एक सूत्र था— 'पहले विकास, फिर सरकार।'

सत्ता पक्ष में होकर भी सत्ता के खिलाफ क्यों?
तत्कालीन प्रांतीय सरकार में उनकी पार्टी सत्ता साझेदार थी। आमतौर पर सत्ताधारी दल के विधायकों से उम्मीद की जाती है कि वे सरकार के साथ समन्वय करके अपने क्षेत्र में योजनाएं लाएंगे। लेकिन विक्की के मामले में, उनसे जुड़े लोगों का कहना है कि उन्होंने कुछ विकास मुद्दों पर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए दबाव और विरोध का रास्ता चुना।
अपने निर्वाचन क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में सड़कों, कृषि सड़कों, पेयजल, सामुदायिक भवनों जैसे बुनियादी ढांचों की आवश्यकता बताते हुए उन्होंने प्रांतीय सरकार से बार-बार योजनाओं की मांग की। न केवल विकास बजट के तहत, बल्कि सरकार की अन्य एजेंसियों से भी योजनाएं खींचने के लिए उन्होंने राजनीतिक दबाव बनाया। इसी कारण उनके समर्थक उन्हें 'विकास पुरुष' कहकर संबोधित करने लगे। हालांकि, उनकी यह पहचान राष्ट्रीय राजनीति के व्यापक दायरे में अधिक चर्चा में नहीं आ सकी।
2079 में 48 वोटों का फैसला
राजनीति में लोकप्रियता और चुनावी नतीजे हमेशा एक ही दिशा में नहीं चलते। इसका एक उदाहरण 2079 के चुनाव में सप्तरी-3 (ख) में देखने को मिला।
जनता समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी बने विदेश्वर प्रसाद यादव 'विक्की' 10,814 वोटों पर रुक गए। जनमत पार्टी के शंभू कुमार साह 10,862 वोट हासिल कर 48 वोटों से विजयी हुए।

पाँच साल पहले स्पष्ट अंतर से जीते यादव इस बार महज कुछ दर्जनों वोटों के अंतर से पराजित हो गए।
इस नतीजे ने एक सवाल छोड़ दिया— विकास कार्य करने का दावा करने वाला जन प्रतिनिधि इतने कम अंतर से क्यों हारा?
इसका उत्तर किसी एक कारण तक सीमित नहीं किया जा सकता। चुनाव में दलीय समीकरण, उम्मीदवार के प्रति धारणा, स्थानीय राजनीतिक संबंध, नई राजनीतिक ताकतों का उभार और मतदाताओं की तात्कालिक प्राथमिकताएं—ये सभी प्रभाव डाल सकते हैं।
लेकिन विक्की के समर्थक पार्टी के भीतर के शक्ति संघर्ष और राजनीतिक असहयोग को भी उनकी हार से जोड़कर देखते हैं। वे शीर्ष नेतृत्व से पर्याप्त राजनीतिक सहयोग न मिलने का आरोप लगाते हैं। हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं हो सकी है।
विकास की तलाश में सीमा पार पटना
विक्की यादव की राजनीतिक यात्रा का सबसे उल्लेखनीय अध्याय था— पश्चिमी कोशी नहर की समस्या लेकर पटना पहुँचना।
नेपाल-भारत कोशी समझौते से जुड़ी पश्चिमी कोशी नहर का नेपाल की तरफ का हिस्सा लंबे समय से जर्जर स्थिति में था। नहर के साथ बनी सड़क भी खराब हो जाने के कारण सप्तरी के सीमावर्ती इलाकों के नागरिकों को आवाजाही में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था।
मधेश प्रदेश सरकार और अन्य स्तरों से भारतीय पक्ष का ध्यान आकर्षित करने के प्रयास किए गए थे, लेकिन उनके अनुसार समस्या समाधान में अपेक्षित गति नहीं आई थी।
इसके बाद वे स्वयं भारत के बिहार पहुँचे।
तत्कालीन प्रांतीय सभा सदस्य विदेश्वर प्रसाद यादव 'विक्की' ने बिहार की तत्कालीन उप-मुख्यमंत्री रेणु देवी से मुलाकात कर कोशी समझौते के कार्यान्वयन और पश्चिमी कोशी नहर से जुड़ी समस्याओं की ओर ध्यान आकृष्ट कराया।
उन्होंने भारतीय पक्ष के संबंधित अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व से मुलाकात कर नहर तथा उससे जुड़ी सड़क की मरम्मत और पुनर्निर्माण का मुद्दा उठाया।
यह केवल एक सड़क की मांग नहीं थी। सीमावर्ती क्षेत्र के किसानों के लिए नहर सिंचाई से जुड़ा ढांचा है, तो उसकी पटरी की सड़क स्थानीय बस्तियों के लिए जीवन रेखा है।

28 साल बाद उठा सवाल?
जब विक्की पटना पहुँचकर भारतीय अधिकारियों से मिले, तो उन्हें प्रतिक्रिया मिली कि नेपाल की ओर से पश्चिमी कोशी नहर की समस्या पर सीधे इस तरह ध्यान खींचने वाले वे पहले जन प्रतिनिधि थे। बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग के अभिलेखों में पश्चिमी कोशी मुख्य नहर के नेपाल खंड की मरम्मत और गाद (सिल्ट) की सफाई के लिए निविदा (टेंडर) संबंधी सूचना प्रकाशित हुई दिखती है।
इससे कम से कम एक बात स्पष्ट होती है— नेपाल की ओर पश्चिमी कोशी नहर का विषय भारतीय जल संसाधन एजेंसी के औपचारिक कार्यक्षेत्र में शामिल था।
विक्की के अनुसार, उनकी पहल के बाद प्रक्रिया आगे बढ़ी और अंततः नहर तथा उससे जुड़ी सड़क के निर्माण/मरम्मत का कार्य शुरू होने की स्थिति बनी। भारतीय कंस्ट्रक्शन कंपनी के सहयोग से जल संसाधन विभाग बिहार द्वारा निर्मित की जा रही इस परियोजना का कुल बजट 34,84,23,90,982 भारतीय रुपये है।

एक विधायक का प्रयास या प्रणाली की प्रक्रिया?
इसी मोड़ पर इस कहानी का एक और पहलू भी है।
कोई बड़ी सरकारी परियोजना केवल एक व्यक्ति के प्रयास से पूरी नहीं होती। उसके लिए दो देशों के बीच समझौते, संबंधित सरकारों, मंत्रालयों, विभागों, तकनीकी निकायों, बजट, निविदा और निर्माण प्रक्रियाओं सहित कई स्तरों की भूमिका होती है। लेकिन वर्षों से उलझे स्थानीय मुद्दे को संबंधित देश की राजधानी तक ले जाकर संबंधित निकायों का ध्यान खींचना भी जन प्रतिनिधि की भूमिका का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
विक्की की कहानी इसी बिंदु पर दिलचस्प बनती है।
सीमावर्ती गाँव की राजनीति से विकास की राजनीति
सप्तरी-3 (ख) के भूगोल को देखें तो यह काठमांडू की राजनीतिक बहसों में बार-बार चर्चा में आने वाला क्षेत्र नहीं है। लेकिन यहाँ के गाँवों तक सड़क पहुँची है या नहीं, नहर चलती है या नहीं, पीने का पानी उपलब्ध है या नहीं, किसान अपनी उपज बाजार तक ले जा सकते हैं या नहीं—ये मुद्दे वहाँ के नागरिकों के लिए राष्ट्रीय राजनीति की बहसों से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं।
उनके समर्थकों का कहना है कि विक्की यादव के कार्यकाल का मूल्यांकन इसी स्थानीय स्तर पर किया जाना चाहिए।
उनके अनुसार, 17 वार्डों में फैले इस क्षेत्र में उन्होंने ग्रामीण और कृषि सड़कों, पेयजल, सामुदायिक भवनों, मंदिरों, मस्जिदों सहित छोटी और मध्यम परियोजनाओं को लाने की पहल की।
इनमें से कितनी योजनाएं पूरी हुईं, वे कितनी गुणवत्तापूर्ण हैं, किस बजट में बनीं और उनका दीर्घकालिक प्रभाव क्या रहा, इसके लिए एक अलग सार्वजनिक लेखा-जोखा आवश्यक है।
लेकिन राजनीति को केवल चुनाव जीत-हार के आंकड़ों से देखने पर ऐसा मूल्यांकन छूट सकता है।

48 वोटों से हारा चुनाव, लेकिन कायम रहे सवाल
2079 के चुनावी नतीजे ने विक्की यादव को प्रांतीय सभा से बाहर कर दिया। लेकिन वह हार कोई सामान्य राजनीतिक पराजय नहीं थी—वह महज 48 वोटों के अंतर से हुई हार थी।
यह उनकी राजनीतिक यात्रा की एक विडंबना को दर्शाता है।
2074 में स्पष्ट बहुमत से चुने गए यादव पाँच साल के कार्यकाल के बाद अपने ही क्षेत्र में अत्यंत कड़े मुकाबले की स्थिति में पहुँच गए। दूसरी ओर, चुनाव हारने के बावजूद वे हाल के समय में भी जसपा के राजनीतिक ढांचे में सक्रिय दिखाई देते हैं। जसपा के एक दस्तावेज़ में उन्हें केंद्रीय समिति सदस्य के रूप में उल्लिखित किया गया है।
इसलिए विक्की की कहानी केवल 'एक बार जीतने वाले, दूसरी बार हारने वाले नेता' की कहानी नहीं है।
यह कहानी इस सवाल से भी जुड़ती है कि ग्रामीण क्षेत्र से आया जन प्रतिनिधि जब विकास के स्थानीय मुद्दों को राजनीतिक प्राथमिकता बनाता है, तो उसके काम का मूल्यांकन कैसे किया जाता है।
इतिहास कौन लिखता है?
राजनीति में चर्चा पाने वाले अक्सर वे होते हैं जिन्हें बड़ा मंच मिलता है, जो बड़े भाषण देते हैं या सोशल मीडिया पर लगातार दिखाई देते हैं।
लेकिन विकास की राजनीति कभी-कभी बेहद शांत होती है।
एक ग्रामीण सड़क बनने के बाद उसके उद्घाटन की तस्वीर कुछ ही दिनों में ओझल हो सकती है। जर्जर नहर की मरम्मत के बाद उससे पानी पाने वाला किसान वर्षों तक उसका लाभ उठा सकता है। सामुदायिक भवन बनने के बाद उसमें होने वाले सैकड़ों कार्यक्रमों का हिसाब शायद खबरों में न आए।
इसलिए जन प्रतिनिधि का वास्तविक मूल्यांकन केवल उनकी चर्चा से नहीं, बल्कि सार्वजनिक पद पर रहते हुए उठाए गए मुद्दों, लाई गई योजनाओं, पूरे किए गए कार्यों और जनजीवन पर पड़े उनके प्रभाव से होना चाहिए।
विक्की यादव की राजनीतिक यात्रा भी यही सवाल उठाती है।
केंद्र की राजनीति की बुलंद आवाजों के बीच सीमावर्ती गाँवों के लिए सड़क, नहर, पेयजल और बुनियादी ढांचे की मांग करते हुए चलने वाले जन प्रतिनिधि के काम को इतिहास में कितनी जगह मिलती है?
2079 के चुनाव में 48 वोटों से हारकर भी विक्की यादव की राजनीतिक कहानी वहीं समाप्त होती प्रतीत नहीं होती।
बल्कि उनकी कहानी एक अलग बहस की शुरुआत करती है—
क्या राजनीति में लोकप्रियता और विकास का मूल्यांकन एक ही तराजू पर होता है?
और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण सवाल—
क्या चुनाव हारना और जनता के लिए किए गए काम का हारना एक ही बात है?