RSP के भीतर अजीब स्थिति: बिना सदस्यता टिकट पाने वाले सांसद अब मंत्री बनने के लिए किससे संपर्क करें, इसे लेकर असमंजस में हैं, जबकि बालेन सोशल मीडिया में सक्रिय हैं।

काठमांडू — राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (RSP) के सरकार गठन की स्थिति बनते ही राजनीतिक हलकों में एक अभूतपूर्व और असामान्य परिदृश्य सामने आया है। पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए गए बालेन्द्र शाह (बालेन) अभी तक RSP के साधारण सदस्य भी नहीं हैं। दूसरी ओर, हाल ही में निर्वाचित अधिकांश सांसद भी औपचारिक सदस्यता से वंचित हैं।

संसदीय परंपरा में प्रधानमंत्री आमतौर पर संसदीय दल के नेता और पार्टी के महत्वपूर्ण पदाधिकारी होते हैं। लेकिन चुनाव से पहले RSP और बालेन के बीच हुए “विशेष समझौते” के आधार पर उन्हें प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाया गया। हालांकि, वह कब और कैसे पार्टी की औपचारिक सदस्यता लेंगे, यह अब भी स्पष्ट नहीं है।

बालेन की दूरी: कार्यालय नहीं, सोशल मीडिया पर सक्रियता

देश के कार्यकारी प्रमुख बनने की स्थिति में होने के बावजूद बालेन की दिनचर्या असामान्य दिख रही है। सरकार गठन के दौरान जहां गहन तैयारी और राजनीतिक बैठकों की अपेक्षा होती है, वहां वह नियमित रूप से पार्टी कार्यालय (वनस्थली) नहीं जा रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार, जब पार्टी के भीतर आंतरिक चर्चा चल रही है, वह अपने मित्रों के साथ सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। संभावित राष्ट्रीय नेतृत्व का यह “कैज़ुअल” रवैया पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं के लिए चिंता का विषय बना है।

सांसदों की उलझन: न रवि मिलते, न बालेन

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चुनाव से पहले RSP ने पार्टी संरचना से बाहर के लोकप्रिय चेहरों को टिकट दिया था। वे गैर-सदस्य उम्मीदवार चुनाव जीतकर सांसद तो बन गए, लेकिन अब गहरे असमंजस में हैं।

मुख्य समस्या “सत्ता केंद्र” की पहचान की है। सांसद मंत्री बनने की दौड़ में हैं, लेकिन लॉबिंग किससे करें, यह स्पष्ट नहीं है। पार्टी के भीतर कमांड की स्पष्ट संरचना नहीं है।

एक नव निर्वाचित सांसद ने कहा, “मंत्री बनने की इच्छा है, लेकिन बात किससे करें? बालेन प्रधानमंत्री बनने वाले हैं, पर उनसे कहां मिलें पता नहीं। पार्टी अध्यक्ष रवि लामिछाने से मिलना भी आसान नहीं। हम बीच में फंसे हुए हैं।”

RSP के सामने नेतृत्व प्रबंधन की चुनौती

इस स्थिति ने RSP के संगठनात्मक असंतुलन को उजागर कर दिया है। गैर-सदस्यों को टिकट देना चुनाव जीतने की रणनीति के रूप में सफल रहा, लेकिन शासन और संसदीय प्रबंधन में यह चुनौती बन सकता है।

जब पार्टी एक तरफ और प्रधानमंत्री उम्मीदवार दूसरी तरफ हों, तो सरकार के फैसलों पर पार्टी की भूमिका कैसे सुनिश्चित होगी, यह बड़ा सवाल है। सांसदों को पार्टी अध्यक्ष के पास जाना चाहिए या प्रधानमंत्री उम्मीदवार का इंतजार करना चाहिए—यह स्पष्ट नहीं है। यदि सरकार गठन से पहले शक्ति संतुलन और समन्वय स्पष्ट नहीं किया गया, तो नई सरकार शुरुआत में ही आंतरिक टकराव का सामना कर सकती है।