दशकों तक दहाई अंक की विकास दर से दुनिया को चौंकाने वाली चीनी अर्थव्यवस्था इस समय मूल्यह्रास और कमजोर आन्तरिक मांग की गंभीर चुनौती से जूझ रही है। उपभोक्ता कीमतों में आई सुस्ती ने चीन के आर्थिक मॉडल पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जुलाई महीने में चीन का उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) घटकर महज 0.5 प्रतिशत रह गया, जो पिछले छह महीनों में सबसे सुस्त रफ्तार है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद चीनी बाजार में महंगाई का न बढ़ना यह दर्शाता है कि घरेलू स्तर पर सामानों की मांग बेहद कमजोर बनी हुई है।
रियल एस्टेट और निजी क्षेत्र पर छाए संकट के बादल
चीन की यह आर्थिक समस्या फौरी न होकर संरचनात्मक है। दशकों से चीन की वृद्धि कर्ज पर आधारित बुनियादी ढांचे, निर्यात और रियल एस्टेट बाजार पर निर्भर रही है। हालांकि, बड़े डेवलपर्स के दिवालिया होने के कारण रियल एस्टेट सेक्टर बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जिससे करोड़ों घर खरीदारों की पूंजी फंस गई है।
संपत्ति के गिरते दामों ने आम नागरिकों की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है, जिससे लोग खर्च करने के बजाय बचत को प्राथमिकता दे रहे हैं। युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी और स्थिर वेतन वृद्धि के कारण उपभोक्ता भविष्य को लेकर आशंकित हैं और खरीदारी टाल रहे हैं।
सरकारी नीतियां और विदेशी निवेशकों की दूरी
तकनीकी, शिक्षा और निजी उद्यमों पर सरकार की कड़ी विनियामक कार्रवाई से निजी क्षेत्र का आत्मविश्वास डिगा है। राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों को तरजीह दिए जाने के कारण रोजगार पैदा करने वाली निजी कंपनियां पूंजी की कमी महसूस कर रही हैं। इसके परिणामस्वरूप विदेशी निवेशक भी अपनी पूंजी चीन से निकालकर अन्य एशियाई देशों में ले जा रहे हैं।
इसके अलावा, चीन की तेजी से बुजुर्ग होती आबादी और घटती कार्यबल संख्या भी आर्थिक विकास की गति को धीमा कर रही है। स्थानीय सरकारों पर बढ़ता कर्ज का बोझ स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना रहा है।
हालांकि चीन के पास मजबूत विनिर्माण क्षमता और व्यापक संसाधन मौजूद हैं, लेकिन जब तक आम जनता के विश्वास को बहाल नहीं किया जाता और घरेलू खपत को बढ़ावा नहीं दिया जाता, तब तक इस मंदी के चक्र से उबरना बीजिंग के लिए एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।