मध्यम स्तर का जन्म
दस साल के माओवादी विद्रोह और २००७ के मधेश आंदोलन की भू-राजनीतिक दरारों से जन्मे, नेपाल के संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य में संक्रमण को २०१५ के संविधान द्वारा औपचारिक रूप दिया गया था। इस प्रणाली को उस केंद्रीकृत एकात्मक राज्य को खत्म करने के लिए तैयार किया गया था जिसने लंबे समय से मधेशी, जनजाति और दूरदराज के समुदायों को हाशिए पर रखा था। २०१७ के चुनावों के साथ शुरू हुई नई संरचना ने सरकार के तीन स्तरों की शुरुआत की: संघीय, प्रांतीय और स्थानीय। सात प्रांतों वाले प्रांतीय स्तर का उद्देश्य "सिंह दरबार" (केंद्रीय सचिवालय) को गांव के स्तर तक लाना था, जिसमें नागरिकों से वादा किया गया था कि उन्हें अब बुनियादी सेवाओं के लिए काठमांडू की यात्रा करने की आवश्यकता नहीं होगी।
शासन का वित्तीय बोझ
इस प्रयोग के लगभग एक दशक बाद, प्रांतीय स्तर को बनाए रखने की लागत राष्ट्रीय बहस का केंद्र बिंदु बन गई है। आंकड़े बताते हैं कि प्रांतीय सरकारें अपने बजट का लगभग ६० से ७० प्रतिशत हिस्सा पूंजी निर्माण या विकास के बजाय वेतन, भत्ते और वाहनों की खरीद जैसे आवर्तक व्यय (recurrent expenditures) पर खर्च करती हैं। वित्तीय ढांचा एक स्पष्ट निर्भरता को उजागर करता है; औसतन, प्रांत अपने स्वयं के राजस्व का १२ प्रतिशत से भी कम पैदा करते हैं, जिसमें कर्णाली प्रांत तो मात्र १ से २ प्रतिशत ही जुटा पाता है। नतीजतन, अपने कामकाज के लिए प्रांत राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन तथा वित्त आयोग (NNRFC) और संघीय सरकार द्वारा वितरित वित्तीय समानीकरण और सशर्त अनुदानों पर बहुत अधिक निर्भर हैं।
पहचान का संकट और प्रशासनिक गतिरोध
जहां स्थानीय सरकारों ने जन्म पंजीकरण और कृषि सेवाएं प्रदान करने में उच्च दृश्यता हासिल की है, वहीं प्रांतीय स्तर गंभीर पहचान संकट से जूझ रहा है। अक्सर इसकी आलोचना एक "डाकिया" स्तर के रूप में की जाती है जो केवल केंद्र से निधियों को स्थानीय स्तर तक पहुंचाता है। संघीय केंद्र के साथ कानूनी रस्साकशी ने इस अक्षमता को और बढ़ा दिया है। संघीय सिविल सेवा अधिनियम वर्षों से रुका हुआ है, और संघीय सरकार, संघीय मामले और सामान्य प्रशासन मंत्रालय (MoFAGA) और प्रधानमंत्री कार्यालय के माध्यम से, पुलिस और मुख्य जिला अधिकारियों (CDOs) पर पूरी तरह से शक्ति हस्तांतरित करने से इनकार करती है। इस केंद्रीकरण ने प्रांतीय गृह मंत्रियों को कानूनी रूप से मौजूद तो रखा है, लेकिन अपनी सीमाओं के भीतर कानून और व्यवस्था के मामले में वे व्यावहारिक रूप से शक्तिहीन हैं।
घोटाले और नागरिक अशांति
प्रलेखित वित्तीय अनुशासनहीनता और राजनीतिक विवादों ने जनता के असंतोष को हवा दी है। महालेखा परीक्षक (Auditor General) की रिपोर्टों ने बार-बार "असाड़े विकास" (जुलाई/आषाढ़ में विकास) की प्रथा को चिह्नित किया है, जहां प्रांत वित्तीय वर्ष के अंतिम महीने (जुलाई) में अपने पूंजीगत बजट का ४० से ५० प्रतिशत खर्च कर देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप निम्न-गुणवत्ता वाला बुनियादी ढांचा बनता है। इसके अलावा, २०२३ में प्रांत १ का नाम "कोशी" रखने के निर्णय ने किरात और लिंबू समूहों द्वारा हिंसक पहचान-आधारित विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया, जिसके परिणामस्वरूप प्रदर्शनकारी पदम लिंबू की मौत हो गई और सुरक्षा कर्फ्यू लगाने की आवश्यकता पड़ी। इस अशांति ने उन पहचान के मुद्दों को हल करने में प्रांतीय ढांचे की विफलता को उजागर किया जिन्हें संबोधित करने के लिए ही संघवाद को डिजाइन किया गया था।
स्थिरता के लिए संघर्ष
२०२३ की आर्थिक मंदी के दौरान इस प्रणाली की नाजुकता पूरी तरह से उजागर हो गई थी। जैसे ही संघीय राजस्व के स्रोत सूखे, प्रांतों को होने वाले हस्तांतरण में कटौती की गई, जिससे उन उप-राष्ट्रीय सरकारों को लकवा मार गया जिनके पास आंतरिक राजस्व तंत्र की कमी है। २०२४/२५ के वित्तीय वर्ष तक, केवल बागमती प्रांत को अपेक्षाकृत आत्मनिर्भर माना जाता है, जिसका मुख्य कारण रियल एस्टेट और वाहन कर हैं, जबकि सुदूरपश्चिम जैसे प्रांत लगभग ९० प्रतिशत तक काठमांडू पर निर्भर हैं। अब विमर्श कार्यान्वयन से हटकर अस्तित्व रक्षा पर केंद्रित हो गया है, और विशेषज्ञों के बीच यह आम सहमति बढ़ रही है कि प्रणाली को वित्तीय पतन से बचाने के लिए ५५० प्रांतीय विधानसभा सदस्यों और संबंधित मंत्रालयों की संख्या को कम किया जाना चाहिए।
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