विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों से पता चला है कि भारत ने हाल के वर्षों में रक्षा उत्पादन, मिसाइल तकनीक और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में उल्लेखनीय प्रगति की है। विश्लेषण किया गया है कि यह भारत को न केवल दक्षिण एशिया में बल्कि वैश्विक स्तर पर एक उभरती हुई रणनीतिक और तकनीकी शक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है।

खबर सामने आई है कि भारतीय रक्षा अनुसंधान संगठन (DRDO) ने 1500 किलोमीटर तक मार करने वाली नई मिसाइल प्रणाली विकसित की है। इसे भारतीय नौसेना की क्षमता में एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।

इसी तरह, भारत की निजी अंतरिक्ष कंपनी "स्काईरूट" (Skyroot) देश की पहली स्पेस-टेक यूनिकॉर्न बन गई है। यह भारत में निजी क्षेत्र के अंतरिक्ष उद्योग के तेजी से विस्तार का संकेत देता है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत अब सरकारी कार्यक्रमों से निजी प्रौद्योगिकी-आधारित अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की ओर तेजी से बढ़ रहा है।

रक्षा निर्यात में भी भारत ने उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, 2017 के बाद से भारत का रक्षा निर्यात 25 गुना तक बढ़ गया है। विश्लेषण है कि यह भविष्य में भारत को वैश्विक रक्षा बाजार का एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना सकता है।

भारत रूस, वियतनाम, यूएई जैसे देशों के साथ रणनीतिक और रक्षा सहयोग का विस्तार करता हुआ भी दिखाई दे रहा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र, समुद्री सुरक्षा और दुर्लभ खनिज (rare earth minerals) के क्षेत्र में भारत की सक्रियता बढ़ती जा रही है।

विश्लेषकों के अनुसार, भारत की बढ़ती रक्षा और तकनीकी क्षमता दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है। विशेष रूप से चीन-भारत प्रतिस्पर्धा तेज होने के कारण, यह अनुमान लगाया गया है कि नेपाल जैसे छोटे हिमालयी राष्ट्र अधिक रणनीतिक रूप से संवेदनशील स्थिति में पहुँच सकते हैं।

नेपाल के लिए भारत की तकनीकी और रक्षा प्रगति को अवसर और चुनौती दोनों के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि एक ओर क्षेत्रीय बुनियादी ढांचे, तकनीक और अंतरिक्ष सहयोग की संभावनाएं बढ़ सकती हैं, वहीं दूसरी ओर दक्षिण एशिया में सैन्य प्रतिस्पर्धा तेज होने पर कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी बढ़ सकती है।

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