वैश्विक मंच पर विकसित देशों के बढ़ते प्रभुत्व के बीच विकासशील राष्ट्रों के हितों की रक्षा के लिए नई दिल्ली ने खुद को 'ग्लोबल साउथ' के एक मजबूत और विश्वसनीय प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करना शुरू कर दिया है। स्वास्थ्य, तकनीक और आर्थिक सहयोग के क्षेत्रों में भारत द्वारा हाल ही में उठाए गए नीतिगत कदमों ने इस बात को और अधिक स्पष्ट कर दिया है कि वह विकासशील देशों का साझा नेतृत्व करने की दिशा में अग्रसर है।

विभिन्न अंतरराष्ट्रीय नीतिगत विश्लेषणों से संकेत मिलते हैं कि भारत ने एशिया और अफ्रीका के उभरते देशों के साथ स्वास्थ्य सेवा और बुनियादी ढांचागत विकास में अपनी साझेदारी को व्यापक रूप से बढ़ाया है। विशेष रूप से कम लागत वाली जीवन रक्षक दवाओं का उत्पादन और संकट के समय अन्य विकासशील देशों की मदद करने की भारत की क्षमता को ग्लोबल साउथ के नेतृत्व से जोड़कर देखा जा रहा है।

नेपाल के दृष्टिकोण से यह कूटनीतिक बदलाव बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नेपाल हमेशा से ही गुटनिरपेक्षता और बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का समर्थक रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को मजबूती से उठाने में सफल रहता है, तो नेपाल जैसे पड़ोसी और छोटे देशों को भी कूटनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर इसका सीधा लाभ मिल सकता है।

इस बदलते परिदृश्य के बीच क्षेत्र के अन्य देशों की भूमिकाएं भी भिन्न नजर आ रही हैं। चीन हालांकि खुद को विकासशील देशों का सबसे बड़ा सहयोगी बताता रहा है, लेकिन उसकी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) परियोजना से जुड़े कर्ज और रणनीतिक हितों के कारण कई देशों में उसे लेकर संदेह की स्थिति बनी हुई है। वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान अपनी आंतरिक आर्थिक बदहाली, राजनीतिक अस्थिरता और विदेशी निवेश की कमी के कारण इस वैश्विक विमर्श से पूरी तरह बाहर दिखाई दे रहा है।

मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में जब प्रतिनिधित्व को लेकर नए सिरे से बहस छिड़ी हुई है, भारत का यह प्रयास ग्लोबल साउथ को एक नई दिशा देने की क्षमता रखता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह पहल विकासशील देशों के साझा आर्थिक और सामाजिक विकास को वास्तविक धरातल पर कितना बदल पाती है।