आकांक्षा धामी - भदौ १० गते रसुवा के भोटेकोशी क्षेत्र में आई अप्रत्याशित बाढ़ और भूस्खलन ने न केवल घर, सड़क और भौतिक संरचनाओं को बहा दिया, बल्कि कई परिवारों के सपने, उम्मीदें और अपने लोगों को भी बहा ले गया। आंखों के सामने आई इस आपदा ने एक बार फिर हमें स्तब्ध कर दिया है।

संभवतः २०७२ के महाभूकंप के बाद इतने बड़े जन-धन के नुकसान का दर्द नेपाली समाज को एक बार फिर महसूस करना पड़ा है। आपदा की इस घड़ी में शब्द कमजोर लगते हैं, आंसू भी कम लगते हैं। लेकिन मन के भीतर एक गहरा सवाल उठता है– हम जीवित बचे लोगों की जिम्मेदारी क्या है?

बाढ़ द्वारा बहाकर लाए गए शवों को देखकर रूह कांप उठती है। लेकिन उसी त्रासदी के बीच किसी के शरीर से गहने निकालने, बाढ़ में बहकर आए गैस सिलेंडर जैसे सामान अपने घर में जुटाने वाले लोगों के दृश्य भी सोशल मीडिया पर देखे गए। उन दृश्यों ने बाढ़ के दर्द से भी बड़ा एक और दर्द पैदा कर दिया। क्या आपदा के बहाव के साथ हमारी इंसानियत भी बहने लगी है?

बाढ़ शव और गैस सिलेंडर एक साथ बहाकर लाई। लेकिन विडंबना ऐसी देखी गई– गैस सिलेंडर खींचने के लिए हाथ आगे बढ़े, लेकिन बाढ़ में बहकर आए इंसान के शव को बहने दिया गया, उसका उद्धार नहीं किया गया।

लेकिन, पूरे समाज को एक ही तराजू में तौलकर दोष देना भी उचित नहीं होगा। आपदा में अपनी जान जोखिम में डालकर बचाव कार्य में जुटने वाले लोग भी हैं। अनजान व्यक्ति के आंसू पोंछने के लिए अपने निवाले का त्याग करने वाले भी हैं। रात-दिन की परवाह किए बिना राहत सामग्री लेकर पहुंचने वाले भी हैं। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इंसानियत खो गई या नहीं, बल्कि हमारे आसपास इंसानियत जिंदा है तो उसे और मजबूत बनाने की जिम्मेदारी किसकी है?

सरकार को बचाव, राहत और पुनर्वास का नेतृत्व करना चाहिए। लेकिन आपदा केवल सरकार की परीक्षा नहीं है, यह समाज की भी परीक्षा है। बचाव के लिए राज्य के तंत्र पहुंचने में समय लग सकता है। तब तक पड़ोसी का हाथ, स्थानीय युवाओं का साहस, स्वयंसेवकों की सक्रियता और आम नागरिकों की संवेदना ही किसी के लिए जीवन का सहारा बन सकती है।

लेकिन हममें से कई लोगों का ध्यान कभी-कभी बचाव कार्य से ज्यादा मोबाइल के कैमरे की तरफ चला जाता है। किसी के दुख को दृश्य बनाना, घटनास्थल की भयावहता को रिकॉर्ड करना, अपुष्ट खबरें फैलाना और 'व्यूज' तथा वायरल होने की दौड़ में शामिल होने की प्रवृत्ति पीड़ितों के दर्द पर एक और दर्द बढ़ा सकती है।

याद रखें, आपदा के समय एक गलत सूचना भी किसी के परिवार के लिए बहुत बड़ा मानसिक आघात बन सकती है। बाढ़ में अपनों के लापता होने की खबर से तड़प रहे परिवार को जब सोशल मीडिया पर फैली अपुष्ट मौत की खबर दिखती है, तो उसे कितना गहरा सदमा पहुंचता होगा? इसलिए आपदा के समय हर शब्द जिम्मेदार होना चाहिए, हर सूचना सत्यापित होनी चाहिए और कोई भी दृश्य सार्वजनिक करने से पहले मानवीय संवेदना को याद रखना चाहिए।

आपदा का समय तमाशा देखने का समय नहीं है, व्यूज कमाने का समय नहीं है। दूसरों के दुख को सामग्री बनाने का समय नहीं है। यह तो इंसान बनकर इंसान के साथ खड़े होने का समय है।

हम भाग्यशाली हैं कि हम जीवित हैं। यदि हमारे परिजन सुरक्षित हैं तो यह केवल हमारा सौभाग्य नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी भी है। आज जो हमारा घर सुरक्षित है, कल वह किसी और का आश्रय बन सकता है। आज हमारे हाथ में मौजूद एक कंबल, एक बोरी चावल, एक बोतल पानी, एक दवा या कुछ घंटों का श्रम किसी के जीवन का बड़ा सहारा बन सकता है।

इसलिए खुद से एक सवाल करें, ‘मैं इस आपदा में क्या कर सकता हूं?’ शायद हम सभी बचावकर्मी नहीं बन सकते, सभी लोग घटनास्थल पर नहीं पहुंच सकते, लेकिन राहत में सहयोग तो कर सकते हैं। सही सूचना फैला सकते हैं और गलत सूचना रोक सकते हैं। पीड़ितों का सम्मान कर सकते हैं, बचाव में जुटे लोगों की मदद कर सकते हैं और कम से कम दूसरों के दुख को तमाशा न बनाने का फैसला तो कर सकते हैं।

संकट केवल घर और सड़कें नहीं तोड़ता, यह समाज के चरित्र को भी उजागर करता है। आपदा हमारे भीतर के लालच और संवेदनशीलता, स्वार्थ और सामूहिकता, मौन और साहस सभी को सामने ला देती है। आज भोटेकोशी, रसुवा, धादिङ, नुवाकोट सहित आपदा प्रभावित क्षेत्रों के पीड़ितों को हमारे साथ की जरूरत है। उन्हें केवल राहत सामग्री नहीं, बल्कि इस विश्वास की जरूरत है कि इंसान अभी भी इंसान ही हैं।

हम जो संयोग से जीवित हैं, जिनके घरों में आज चूल्हा जल रहा है, जिनके प्रियजन सुरक्षित हैं– हमारी जिम्मेदारी दूसरों से भी बड़ी है। आइए, आपदा की इस कठिन घड़ी में नेपालीपन के अर्थ को एक बार फिर साबित करें।

दुख में तमाशा नहीं, साथ दें। व्यूज नहीं, जीवन चुनें। अफवाह नहीं, सच बोलें। स्वार्थ नहीं, इंसानियत चुनें। क्योंकि आपदा में कौन बचेगा यह हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन बचे हुए लोग अपने बचे जीवन का उपयोग कैसे करते हैं, यह निश्चित रूप से हमारे हाथ में होता है।

आपदा आने पर हम कितने सुरक्षित हैं सिर्फ यह नहीं, बल्कि हम कितने मानवीय हैं इस बात की भी परीक्षा होती है। आज दूसरों के दुख में खड़े होने की हमारी बारी है, कल वही हाथ हमारा सहारा बन सकते हैं। इसलिए आपदा में इंसानियत बचाएं।