जब समाज किसी की पहचान को स्वीकार नहीं करता, तब संघर्ष केवल व्यक्तिगत नहीं रहता — वह संस्थागत बन जाता है। नेपाल की मोनिका शाही की कहानी इसी टकराव की मिसाल है।
जन्म के समय मनोज नाम दिए जाने के बावजूद मोनिका की पहचान और अनुभूति महिला के रूप में थी। स्कूल, परिवार और समाज में उन्हें बार-बार अपमान और बहिष्कार झेलना पड़ा। उनके कारण भाई-बहनों को भी तानों का सामना करना पड़ा, जिसका मानसिक असर गहरा था।
लंबे समय तक स्वयं को न समझ पाने और न बता पाने की स्थिति ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। बाद में तीसरे लिंग की पहचान और समुदाय से जुड़कर उन्हें आत्मस्वीकृति मिली।
नागरिकता के लिए आवेदन करते समय उन्होंने पुरुष या महिला के बजाय तीसरे लिंग को चुना। प्रशासन ने पहचान का प्रमाण मांगा — एक ऐसी शर्त जो अन्य नागरिकों पर लागू नहीं होती।
संघर्ष के बाद उन्हें तीसरे लिंग के रूप में नागरिकता और बाद में “O” (Other) चिह्नित पासपोर्ट मिला, जो नेपाल में पहली बार हुआ। यह उपलब्धि व्यक्तिगत होने के साथ-साथ कानूनी और सामाजिक बदलाव का संकेत बनी।
आज मोनिका कहती हैं कि चुप रहना समाधान नहीं है। अधिकार तभी मिलते हैं जब उन्हें दृढ़ता से हासिल किया जाए। उनकी कहानी उन हजारों लोगों के लिए उम्मीद है, जो अब भी अपनी पहचान छुपाकर जी रहे हैं।