नेपाल के सामने रियायती विदेशी सहायता और अनुदान में लगातार आ रही गिरावट के कारण एक नया आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। परंपरागत विदेशी वित्तीय स्रोतों के सीमित होने से देश को अब अपने विकास कार्यों के लिए निजी और वैकल्पिक पूंजी पर निर्भर होना पड़ रहा है।

संसदीय सार्वजनिक लेखा समिति की बैठक के दौरान वित्त मंत्री डॉ. स्वर्णिम वाग्ले ने स्वीकार किया कि दशकों से मिलने वाले १ से १.५ प्रतिशत ब्याज दर और लंबी ग्रेस अवधि वाले बेहद रियायती ऋणों की खिड़की अब धीरे-धीरे बंद हो रही है।

चालू बजट में लगभग २१२ अरब रुपये के विदेशी ऋण और ६२ अरब रुपये के अनुदान का अनुमान लगाया गया है। हालांकि, अतीत के आंकड़े बताते हैं कि कागजी दावों के विपरीत वास्तव में मात्र १० से १५ अरब रुपये का अनुदान ही प्राप्त हो पाता है।

वित्तीय संसाधनों की कमी के साथ-साथ नेपाल की कमजोर पूंजीगत खर्च क्षमता और जटिल खरीद प्रक्रिया भी एक बड़ी बाधा बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग उपलब्ध होने के बावजूद देश समय पर आवंटित राशि का उपयोग करने में विफल रहा है।

विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक जैसे बहुपक्षीय साझेदारों के सख्त शर्तों की वजह से नेपाल अब हाइब्रिड एन्वॉइटी मॉडल, ऑफशोर बॉन्ड और गैर-आवासीय नेपालियों के निवेश जैसे नए वित्तीय तंत्रों को लागू कर रहा है।

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