प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के नेतृत्व वाली सरकार ने नेपाल के श्रमिक वर्ग और लोकतांत्रिक ढांचे पर एक कड़ा प्रहार किया है। 2 मई, 2026 को राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल द्वारा जारी एक विशेष अध्यादेश के बाद देश में सार्वजनिक क्षेत्र की यूनियनों का अस्तित्व समाप्त कर दिया गया है।
सरकार के इस कठोर निर्णय के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
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यूनियनों की समाप्ति: "नेपाल कानून संशोधन अध्यादेश - 207" के तहत राज्य प्रशासन और सिविल सेवा के भीतर संचालित सभी ट्रेड यूनियनों को भंग कर दिया गया है।
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शिक्षकों पर प्रतिबंध: शिक्षा मंत्री महावीर पुन ने स्पष्ट किया है कि राजनीतिक दलों से जुड़े किसी भी शिक्षक संघ को मान्यता नहीं दी जाएगी और राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
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छात्र राजनीति पर रोक: विश्वविद्यालयों में राजनीतिक दलों से संबद्ध छात्र संघों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, जिससे परिसरों में स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्ति का स्थान समाप्त हो गया है।
विश्व शिक्षक संघ महासंघ (FISE) ने सरकार के इस कदम को "तानाशाही की स्थापना" की दिशा में एक कदम बताया है। कर्मचारी लंबे समय से अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संघीय सिविल सेवा अधिनियम की मांग कर रहे थे, लेकिन सरकार ने संवाद के बजाय दमन का रास्ता चुना है।
यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय नियमों का भी उल्लंघन करती है:
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ILO मानकों की अनदेखी: नेपाल ने संगठन बनाने की स्वतंत्रता (कन्वेंशन 87) और सामूहिक सौदेबाजी (कन्वेंशन 98) पर ILO के समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं, जिनका यह आदेश सीधा उल्लंघन है।
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लोकतांत्रिक संकट: विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक संगठनों पर यह हमला नेपाल की लोकतांत्रिक साख को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमजोर कर सकता है।
FISE के महासचिव ड्रिसी अब्देरज्जाक ने वैश्विक स्तर पर मानवाधिकार संगठनों और ILO से हस्तक्षेप की मांग की है। महासंघ ने नेपाली सरकार से अपील की है कि वह इन दमनकारी आदेशों को वापस ले और श्रमिकों व छात्रों के संवैधानिक अधिकारों को बहाल करे।