अनुष्का धामी - बड़े दलों के नेताओं का अहंकार ढहे आज ठीक एक वर्ष पूरा हो चुका है। कांग्रेस में गगन का उदय, एमाले में ओली का ही वर्चस्व, कम्युनिस्ट पार्टी में एकता; क्या सच में बदले नेपाल के बड़े राजनीतिक दल? जेनजी आंदोलन के बाद गुमनाम हुए नेपाल के बड़े दलों के भीतर क्या-क्या बदलाव हुए?

जेनजी आंदोलन के दौरान बड़े दलों के बड़े नेताओं की पिटाई होने, उनके आवासों में आग लगाए जाने और सार्वजनिक संरचनाओं के ध्वस्त होने का आज ठीक एक वर्ष पूरा हो गया है। उस आंदोलन ने नेपाल के राजनीतिक इतिहास में बड़ा मोड़ लाया और दशकों से सत्ता के केंद्र में रहे पुराने राजनीतिक दलों को अचानक रक्षात्मक स्थिति में पहुंचा दिया।

तत्कालीन सरकार द्वारा अचानक 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगाने के बाद सोशल मीडिया से बैन हटाने की मांग करते हुए एक वर्ष पहले जेनजी पीढ़ी सड़कों पर उतरी थी। भदौ 23 गते को शुरुआत में शांतिपूर्ण ढंग से शुरू हुआ प्रदर्शन भदौ 24 तक पहुंचते-पहुंचते सुरक्षा बलों के साथ झड़प के बाद हिंसक रूप ले बैठा।

पुलिस दमन और प्रदर्शनकारियों के साथ हुई झड़पों में 70 से अधिक लोगों की जान चली गई। प्रदर्शन में छात्रों और युवाओं पर गोलियां चलने और उनके सड़कों पर गिरने से आंदोलन ने और भी उग्र रूप ले लिया।

आंदोलन के अगले दिन यानी आज ही के दिन युवाओं का आक्रोश देशभर में फैल गया, जिसके कारण सिंहदरबार, संसद भवन, पुलिस चौकी, सरकारी भवनों और नेताओं के घरों पर तोड़ाफोड़ और आगजनी की घटनाएं हुईं। कई नेता पीटे गए, खदेड़े गए और जान बचाने के लिए छिपकर रहने की स्थिति में पहुंच गए।

इसके बाद नेपाल की पुरानी राजनीतिक शक्ति अचानक कमजोर और रक्षात्मक स्थिति में आ गई। वर्षों से सत्ता के केंद्र में रहे पुराने दलों के नेता तितर-बितर हो गए। जेनजी आंदोलन के बाद एक-दो महीने तक कई शीर्ष नेता सार्वजनिक रूप से दिखाई भी नहीं दिए। लेकिन आंदोलन ने पुराने दलों को एक गंभीर संदेश दिया था कि जनता की आवाज को नजरअंदाज करने वाली राजनीति अब पहले जैसी सुरक्षित नहीं है।

आज, जेनजी आंदोलन के एक वर्ष पूरा होने पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि आंदोलन से मिले उस सबक को नेपाल के पुराने राजनीतिक दलों ने कितना आत्मसात किया? भ्रष्टाचार, कुव्यवस्था, अन्याय और अत्याचार के आरोपों का सामना करते हुए सत्ता गंवाने वाले दलों ने इस एक वर्ष में खुद को कितना बदला? आज हम नेपाल की प्रमुख तीन राजनीतिक शक्तियों—नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले और नेकपा माओवादी यानी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी की स्थिति पर चर्चा कर रहे हैं।

ये तीनों राजनीतिक शक्तियां एक के बाद एक सत्ता में पहुंचीं, दशकों तक देश की राजनीतिक दिशा तय की और राज्य के खजाने को संभाला। लेकिन जेनजी आंदोलन के बाद जनता ने इन्हीं दलों से एक नया सवाल पूछा: अब आप लोग बदलेंगे या फिर वही पुराना ढर्रा दोहराएंगे?

नेपाली कांग्रेस की स्थिति

जेनजी आंदोलन के बाद कांग्रेस के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की बहस तेज हो गई। आंदोलन के दौरान जेनजी युवाओं द्वारा पिटाई खाने के बाद पार्टी सभापति शेर बहादुर देउबा और उनकी पत्नी आरजू राणा देउबा पार्टी की कमान पूर्ण बहादुर खड़का को सौंपकर इलाज के लिए विदेश चले गए। उधर पार्टी के भीतर युवाओं की आवाज और ऊर्जा मजबूत होती चली गई।

वर्षों से एक ही नेतृत्व के प्रभाव में रही कांग्रेस के भीतर नई पीढ़ी को नेतृत्व में लाने की मांग उठने लगी। अंततः 14वें महाधिवेशन से गगन थापा पार्टी नेतृत्व में पहुंचे और नेपाली कांग्रेस के सभापति बने। हालांकि संस्थापन पक्ष ने उनके नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए विरोध जारी रखा और पार्टी में विवाद भी गहराया। लेकिन निर्वाचन आयोग से आधिकारिकता मिलने के बाद गगन थापा के नेतृत्व में पार्टी चुनाव में उतरी। परंतु चुनावी मैदान में कांग्रेस को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली। जेनजी आंदोलन के बाद युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हुई राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) ने चुनाव जीत लिया और कांग्रेस कई स्थानों पर हार गई। यहां तक कि पार्टी सभापति और प्रधानमंत्री पद के दावेदार गगन थापा स्वयं चुनाव हार गए।

लेकिन हार के बाद भी गगन थापा पार्टी को नए ढंग से आगे बढ़ाने का प्रयास करते दिख रहे हैं। पार्टी के भीतर पुराने संस्थापन पक्ष और नए नेतृत्व के बीच मतभेद होने के बावजूद वे पार्टी को एकजुट करने को लेकर सकारात्मक दिखे हैं। चुनाव के दौरान भी गगन थापा ने केवल अपने करीबी नेताओं या पुराने चेहरों को ही प्राथमिकता न देकर नए और युवा चेहरों को अवसर देने का प्रयास किया। इसे कांग्रेस के रूपांतरण के एक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

फिलहाल नेपाली कांग्रेस खुद को नई पीढ़ी से जोड़ने के प्रयास में दिख रही है। पार्टी को बीपी कोइराला के विचारों और लोकतांत्रिक मूल्यों की ओर लौटाने की चर्चा हो रही है। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने अतीत में भ्रष्टाचार और गलत प्रथाओं को देखकर भी चुप रहने की बात स्वीकार करना शुरू कर दिया है। वे स्वीकार कर रहे हैं कि अतीत में गलतियां हुईं और अब उनसे सीखकर आगे बढ़ना चाहिए।

हालांकि, कांग्रेस में आधिकारिकता की लड़ाई अब भी जारी है। पार्टी अपने आंतरिक शक्ति संघर्ष और समानांतर महाधिवेशन के भंवर में उलझी हुई है। 9 महीनों के आंतरिक विवाद और सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन वैधानिकता के मामले के बीच संस्थापन पक्ष और शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाले दूसरे पक्ष ने 15वें महाधिवेशन की अलग-अलग समय-सारणी घोषित कर दी है। संस्थापन समूह ने असोज 16, 19 के लिए महाधिवेशन की तारीख तय की है, जबकि देउबा समूह ने मंसिर में महाधिवेशन कराने का नया शेड्यूल जारी किया है। इससे कांग्रेस विभाजन के कगार पर पहुंच गई है।

परंतु सवाल अब भी बना हुआ है—क्या केवल नेतृत्व बदलने से कांग्रेस सच में बदल जाएगी, या फिर पार्टी का ढांचा, सोच और राजनीतिक संस्कृति भी बदलना जरूरी है?

नेकपा एमाले की स्थिति

2072 (वि.सं.) के आसपास एमाले और केपी शर्मा ओली की लोकप्रियता असाधारण थी। "वी लव केपी बा" का नारा देशभर में गूंजता था। आज काठमांडू के मेयर बालेन शाह की जितनी राजनीतिक चर्चा है, उस समय केपी ओली का राजनीतिक माहौल भी उतना ही बड़ा था।

ओली के नेतृत्व में एमाले ने चुनावों में उल्लेखनीय सफलता हासिल की। लेकिन समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियां बदल गईं। एक समय अत्यंत लोकप्रिय रहे केपी शर्मा ओली आज जनता के एक बड़े हिस्से के बीच आलोचना के पात्र बन गए। जेनजी आंदोलन के दौरान जान बचाने के लिए भागने की नौबत से लेकर उसके बाद के कुछ महीनों तक सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूर रहने तक, एमाले ने कठिन दौर का सामना किया।

पार्टी के भीतर बदलाव की बहस शुरू हुई और नेतृत्व परिवर्तन की मांग उठी। परंतु महाधिवेशन के बाद फिर से केपी शर्मा ओली ही अध्यक्ष बने। ओली नेपाली राजनीति के ऐसे नेता हैं, जिन्हें कई लोग आसानी से न झुकने वाले नेता के रूप में जानते हैं। सत्ता गंवाने के बाद भी वे अपनी शैली और बयानबाजी बदलने के लिए तैयार नहीं दिखे। उल्टा उनकी बयानबाजी बार-बार विवाद पैदा करती रही। झापा 5 से चुनाव लड़ते हुए बालेन शाह के हाथों भारी मतों से पराजित होने के बाद रास्वपा की सरकार बनी। रास्वपा सरकार बनते ही सुधन गुरुंग गृह मंत्री नियुक्त हुए और उनके गृह मंत्री बनते ही अगले दिन केपी शर्मा ओली गिरफ्तार कर लिए गए। ओली की गिरफ्तारी के बाद एमाले नेताओं ने सड़क आंदोलन की चेतावनी दी और उनकी रिहाई के लिए भारी प्रयास किए। बाद में अदालत द्वारा गिरफ्तारी को अमान्य ठहराए जाने पर वे रिहा हुए।

परंतु एमाले में उनके खिलाफ आवाजें थमी नहीं हैं। ओली के करीबी माने जाने वाले महासचिव शंकर पोखरेल ने भी उनका साथ नहीं दिया है। पोखरेल खुद एमाले में पुनर्गठन की मांग उठा रहे हैं। विधान महाधिवेशन या प्रतिनिधि परिषद अधिवेशन के जरिए एमाले नेतृत्व पुनर्गठित करने के शंकर पोखरेल के प्रस्ताव को अध्यक्ष ओली ने 'होल्ड' पर रख दिया है और अपने विरोधियों को 'आवारा' करार दे रहे हैं।

एमाले के भीतर एक और होड़ देखने को मिल रही है—सोशल मीडिया पर कौन ज्यादा बोल सकता है, कौन ज्यादा लिख सकता है, कौन दूसरी पार्टियों का ज्यादा विरोध कर सकता है और कौन ज्यादा वायरल हो सकता है। यह प्रतिस्पर्धा अब भी जारी है। परंतु सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया पर ज्यादा लिखने से जनता का विश्वास वापस लौट आएगा?

एक वर्ष बीत जाने के बाद भी एमाले द्वारा अपनी पुरानी छवि सुधारने का कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिखता। बल्कि पार्टी के भीतर और बाहर आलोचना बढ़ती जा रही है। जेनजी आंदोलन के बाद खुद को नए रूप में प्रस्तुत करने का एमाले का प्रयास उम्मीद के मुताबिक सफल नहीं हो सका। एक समय देश की सबसे लोकप्रिय राजनीतिक शक्तियों में से एक रही एमाले आज अपना खोया जनविश्वास वापस पाने के संघर्ष में जुटी दिखती है।

नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी

यद्यपि जेनजी आंदोलन के समय यह शक्ति प्रत्यक्ष रूप से सत्ता में नहीं थी, फिर भी बीते वर्षों में भ्रष्टाचार और कुव्यवस्था के मामलों में यह दल भी उतने ही सवालों के घेरे में था। आंदोलन के दौरान तत्कालीन नेकपा माओवादी केंद्र के शीर्ष नेता पुष्पकमल दाहाल 'प्रचंड' सहित 19 नेताओं के घरों और निजी संपत्तियों पर तोड़फोड़, लूटपाट और आगजनी हुई थी। इसने यह स्पष्ट कर दिया कि जनता का आक्रोश केवल सत्ता में बैठी एक पार्टी तक सीमित नहीं था, बल्कि अतीत में देश चलाने वाली सभी राजनीतिक शक्तियों पर था।

जेनजी आंदोलन के बाद माओवादी धारा के भीतर पार्टी को कैसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बनाया जाए और कैसे बदला जाए, इस पर बहस शुरू हुई। इसके बाद राजनीतिक एकजुटता का अभियान आगे बढ़ा। वि.सं. 2082 कात्तिक 19 गते को प्रचंड के नेतृत्व वाली नेकपा माओवादी केंद्र और माधव कुमार नेपाल के नेतृत्व वाली नेकपा एकीकृत समाजवादी सहित 10 कम्युनिस्ट घटकों ने मिलकर नई नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी की घोषणा की। इसे जेनजी आंदोलन के बाद नेपाली कम्युनिस्ट आंदोलन में आया सबसे बड़ा संरचनात्मक बदलाव माना जा सकता है। आंदोलन ने पारंपरिक कम्युनिस्ट शक्तियों को रक्षात्मक स्थिति में पहुंचा दिया और उन्हें ध्रुवीकरण तथा रूपांतरण के रास्ते पर जाने के लिए मजबूर किया। हालांकि, युवा पीढ़ी के बीच खोया विश्वास वापस पाना उनके लिए अब भी बड़ी चुनौती है।

यद्यपि चुनाव में प्रचंड की जीत के बाद उनकी राजनीतिक चर्चा फिर बढ़ गई है। उनका अनुभव, राजनीतिक रणनीति और संगठन निर्माण की क्षमता अब भी नेपाली राजनीति में प्रभावशाली दिखती है। लेकिन प्रचंड भी समय-समय पर अपने बयानों के कारण विवादों में घिर जाते हैं। इसलिए नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के लिए भी सवाल वही है: क्या पार्टी का नाम और ढांचा बदलना ही असली बदलाव है, या पुरानी राजनीतिक संस्कृति का बदलना भी जरूरी है?

जेनजी आंदोलन के एक वर्ष बाद नेपाल की राजनीति को देखें तो तीनों बड़े दल अलग-अलग चौराहों पर खड़े दिखते हैं। नेपाली कांग्रेस ने नेतृत्व और पीढ़ीगत बदलाव की दिशा में कुछ कदम बढ़ाए हैं। एमाले अब भी पुराने नेतृत्व और पुरानी शैली के घेरे से बाहर निकलने के लिए संघर्षरत दिखती है। वहीं नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी ने एकता और पुनर्गठन के जरिए नई शक्ति बनने का प्रयास किया है। परंतु तीनों दलों के सामने एक साझा चुनौती है—युवाओं का विश्वास वापस कैसे हासिल किया जाए?

आज की जेनजी पीढ़ी केवल भाषण सुनना नहीं चाहती। वे परिणाम चाहते हैं, पारदर्शिता चाहते हैं, भ्रष्टाचार के खिलाफ वास्तविक कार्रवाई चाहते हैं और अवसर चाहते हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात, वे खुद को पुराने नेताओं के राजनीतिक खेल का दर्शक नहीं, बल्कि देश के भविष्य का निर्णयकर्ता मानते हैं। जेनजी आंदोलन का एक वर्ष बीत चुका है, लेकिन आंदोलन द्वारा उठाए गए सवाल आज भी जीवंत हैं: क्या नेपाल के पुराने राजनीतिक दल सच में बदले हैं, या सिर्फ चेहरे बदले हैं और राजनीति वही पुरानी है?