नेपाल के बाजारों में 'एक्सट्रीम एनर्जी ड्रिंक्स' के अंधाधुंध प्रसार ने जनस्वास्थ्य और बाल सुरक्षा को लेकर एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। ललितपुर स्थित एग्रो थाई फूड्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा निर्मित इस पेय को 'गेम चेंजर' बताते हुए सार्वजनिक बसों, दुकानों के साइनबोर्ड और डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर बड़े पैमाने पर प्रचारित किया जा रहा है। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और उपभोक्ता संगठनों ने इस आक्रामक विपणन रणनीति के पीछे छिपे गंभीर शारीरिक और मानसिक खतरों के प्रति आगाह किया है।
इस पेय की प्रत्येक 330 मिलीलीटर की कैन में लगभग 99 मिलीग्राम कैफीन के साथ टॉरिन और ग्लुकुरोनोलैक्टोन जैसे उत्तेजक रसायन शामिल हैं। दि हिमालयन हेल्थ के डॉ. मनीष यादव ने चेतावनी दी है कि ये सिंथेटिक रसायन बच्चों के विकासशील मस्तिष्क पर सीधा और प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। 18 वर्ष से कम, और विशेष रूप से 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में इसके नियमित सेवन से घबराहट, अनिद्रा, व्यवहार में आक्रामकता, ध्यान की कमी, हाथ-पैर कांपना और यहां तक कि दिल की धड़कन अनियमित होने जैसी गंभीर समस्याएं देखी जा रही हैं। हालांकि कंपनी ने कैन पर बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए इसे अनुपयुक्त लिखा है, लेकिन स्कूलों के आसपास की दुकानों पर इसकी आसान उपलब्धता ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है।
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि नेपाल सरकार के पास एनर्जी ड्रिंक्स की गुणवत्ता जांचने के लिए अपना कोई विशिष्ट मानक ही नहीं है। खाद्य प्रौद्योगिकी एवं गुणवत्ता नियंत्रण विभाग की प्रवक्ता डॉ. बाल कुमारी शर्मा ने पुष्टि की है कि विभाग केवल अंतरराष्ट्रीय मानकों को आधार बनाकर और फूड लाइसेंस के नियमों के तहत काम कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि लेबलिंग में कोई स्पष्ट कमी न होने और अब तक कोई औपचारिक शिकायत न मिलने के कारण इस पर रोक नहीं लगाई गई है।
दूसरी ओर, उपभोक्ता अनुसंधान मंच के अध्यक्ष माधव तिमल्सिना ने नियामक निकायों की इस निष्क्रियता पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी फीफा विश्व कप 2026 के बहाने क्यूआर कोड स्कैन करने पर 'सोने की गेंद' देने का भ्रामक विज्ञापन चलाकर उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। इसके अतिरिक्त, नेपाल विज्ञापन बोर्ड की मुख्य कार्यकारी अधिकारी देवी पांडे ने खुलासा किया कि कंपनी ने विज्ञापन बोर्ड से बिना किसी सेंसर या पूर्व-जांच के ही पूरे देश में अपने होर्डिंग्स लगा दिए हैं। ऐसे में बिना किसी ठोस सरकारी नीति के बाजार में बढ़ते इस उत्पाद के एकाधिकार ने कॉर्पोरेट जवाबदेही और कानून प्रवर्तन पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
