पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में नागरिकों को जबरन गायब किए जाने की निरंतर बढ़ती घटनाओं ने एक गंभीर मानवाधिकार संकट का रूप ले लिया है। स्थानीय मानवाधिकार संगठनों द्वारा जारी की गई नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष २०२६ के अकेले अप्रैल महीने में ही १२४ लोगों को जबरन लापता कर दिया गया है, जो इस क्षेत्र में नागरिक अधिकारों की दयनीय स्थिति को दर्शाता है।

इस दमनकारी कार्रवाई की चपेट में सबसे ज्यादा छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता, राजनीतिक रूप से सक्रिय युवा और महिलाएं आई हैं। स्थानीय राष्ट्रवादी संगठनों का सीधा आरोप है कि राज्य की सुरक्षा एजेंसियां और सुरक्षा बल बलूच नागरिकों को अवैध रूप से अपनी हिरासत में ले रहे हैं और उनके परिवारों को उनकी स्थिति के बारे में कोई भी प्रशासनिक जानकारी नहीं दी जा रही है। दशकों से राजनीतिक असंतोष और विद्रोह का सामना कर रहे बलूचिस्तान में यह संकट लगातार गहराता जा रहा है।

इस भयावह स्थिति का सबसे गंभीर असर पीड़ित परिवारों पर पड़ रहा है, जो अपने प्रियजनों की न्यायसंगत रिहाई के लिए विभिन्न शहरों में लगातार धरने और विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। कई परिवार वर्षों से अपने लापता रिश्तेदारों की भनक तक नहीं पा सके हैं, और कुछ मामलों में तो गायब किए गए व्यक्तियों के क्षत-विक्षत शव मिलने के गंभीर आरोप भी सामने आए हैं।

दूसरी ओर, पाकिस्तानी प्रशासन का तर्क है कि वे क्षेत्र में उग्रवादी गतिविधियों और सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए कदम उठा रहे हैं। इसके विपरीत, मानवाधिकार संस्थाओं का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर बुनियादी नागरिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता। बलूचिस्तान के विभिन्न सामाजिक संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि लापता लोगों का विवरण जल्द सार्वजनिक नहीं किया गया, तो वे अपने आंदोलन को और उग्र करेंगे।

विशेषज्ञों के मुताबिक, बलूचिस्तान में जबरन गायब किए जाने का यह मुद्दा अब केवल मानवाधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान के संघीय ढांचे, प्रांतीय असंतोष और राज्य-समाज के बिगड़ते संबंधों से जुड़ा एक अत्यंत संवेदनशील राजनीतिक प्रश्न बन चुका है, जिस पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।