संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) में पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं के घेरे में है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, विशेष रूप से पश्तून और बलूच प्रतिनिधियों ने यूरोपीय संघ (EU) से पाकिस्तान को दी गई GSP+ (जनरलाइज्ड स्कीम ऑफ प्रेफरेंसेज प्लस) की सुविधा वापस लेने की पुरजोर अपील की है। यह घटनाक्रम इस्लामाबाद के लिए न केवल कूटनीतिक बल्कि एक बड़ी आर्थिक चुनौती बनकर उभरा है।

कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि वहां जबरन गायब किए जाने, न्यायेतर हत्याओं और अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों के दमन का सिलसिला बदस्तूर जारी है। इन आरोपों के अनुसार, पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का पालन करने में पूरी तरह विफल रहा है। GSP+ दर्जा पाकिस्तान के निर्यात के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उसे यूरोपीय बाजारों में शुल्क मुक्त पहुंच प्रदान करता है।

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हालाँकि, पाकिस्तान सरकार ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज किया है और अपनी छवि सुधारने का प्रयास किया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय निकायों की स्वतंत्र रिपोर्टें कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं। यह विरोधाभास वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहा है।

यदि यूरोपीय संघ इन दबावों के चलते व्यापारिक रियायतें निलंबित करता है, तो पहले से ही आर्थिक तंगहाली से जूझ रहे पाकिस्तान की कमर टूट सकती है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संतुष्ट करने के लिए जमीनी स्तर पर कोई ठोस सुधार करता है या वह आर्थिक अलगाव की ओर अग्रसर होगा।