विश्व धरोहर सूची में शामिल पवित्र पशुपतिनाथ मंदिर परिसर हाल के दिनों में धार्मिक आस्था के केंद्र के बजाय बिचौलियों, अपारदर्शी समूहों और प्रशासनिक मिलीभगत का अखाड़ा बन गया है। मंदिर परिसर में कानून की धज्जियां उड़ाते हुए आर्थिक वसूली का धंधा चलाने, श्रद्धालुओं के साथ मारपीट करने और धार्मिक-सांस्कृतिक मर्यादाओं का उल्लंघन करने के कृत्यों में पशुपति विकास कोष के अधिकारियों की ही प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संलिप्तता तथ्यों से उजागर होती है। पशुपतिनाथ की गरिमा पर आघात पहुँचाते हुए 'गुंडा राज' चलाने वाला यह जाल मुख्य रूप से चार पात्रों के इर्द-गिर्द घूम रहा है।

चार मुख्य पात्र और उनका अवांछित कार्यजाल
१. नारायण पौडेल (गंगा आरती समूह):
बागमती नदी के पार से गंगा आरती का संचालन करते आ रहे पौडेल ने पशुपति विकास कोष को किसी भी प्रकार का किराया, रॉयल्टी या जमानत राशि दिए बिना वर्षों से पशुपति परिसर में व्यावसायिक गतिविधियां चला रखी हैं। सरकारी एवं सार्वजनिक संपत्ति का उपयोग करने के एवज में कोष द्वारा राशि की मांग न किए जाने और समय-सीमा निर्धारित न किए जाने की आड़ में उन्होंने मंदिर क्षेत्र में अपनी गतिविधियां बढ़ाई हैं। आरती संचालन के नाम पर हो रही अपारदर्शी गतिविधियों के बारे में पूछे जाने पर पौडेल ने पत्रकारों के साथ रूखा व्यवहार करते हुए "मीडिया हाउस का आधिकारिक पहचान पत्र लेकर आइए, तभी सूचना दूंगा" कहकर किनारा कर लिया। पशुपति और बुढासुब्बा के बीच के विवाद पर टिप्पणी करते हुए पौडेल ने सार्वजनिक रूप से कहा था, "पशुपति विकास कोष और बुढासुब्बा के बीच तमाम हलचलें हुई हैं, वह सब मुझे पता है।" इसके साथ ही बुढासुब्बा डिजिटल पक्ष ने कार्यस्थल पर गंगा आरती समूह द्वारा बाधा डालने और उनके कैमरे तक तोड़फोड़ किए जाने का गंभीर आरोप लगाया है।
२. सूर्य भाट (प्रशासन प्रमुख तथा सूचना अधिकारी, पशुपति विकास कोष):
पशुपति विकास कोष में सूचना अधिकारी एवं प्रशासन प्रमुख की जिम्मेदारी संभाल रहे सूर्य भाट पर सार्वजनिक महत्व की सूचनाओं को छिपाने और अपारदर्शी समूहों को कानूनी छिद्रों का फायदा उठाने देने का मुख्य सरगना होने का आरोप है। लंबे समय तक कोष की लेखा शाखा में कार्यरत रहने के दौरान करोड़ों रुपये की वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े भाट पर सूत्रों के अनुसार अवैध कमाई से काठमांडू में घर और कई भूखंड खरीदने का गंभीर आरोप लगा है। भाट ने नियमानुसार राजस्व चुकाकर काम करने की चाह रखने वाली वैध संस्थाओं को पीछे धकेलते हुए नारायण पौडेल के गंगा आरती समूह और भालेश्वर प्रा.लि. के 'भाले डन' को लगातार संरक्षण दिया है। कोष के जानकार सूत्रों के अनुसार मंदिर परिसर में हफ्ता वसूली करने वालों और अवैध फोटोग्राफी का धंधा चलाने वालों के साथ भाट की अपारदर्शी सांठगांठ रही है। ऐसे गंभीर आरोपों और मौजूदा स्थिति पर प्रतिक्रिया के लिए बार-बार संपर्क करने के प्रयास के बावजूद सूचना अधिकारी सूर्य भाट ने फोन नहीं उठाया।
३. तीर्थप्रसाद श्रेष्ठ (सदस्य सचिव, पशुपति विकास कोष):
पशुपति विकास कोष का कार्यकारी नेतृत्व संभाल रहे श्रेष्ठ की पद की योग्यता और कार्यक्षमता को लेकर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं। मंदिर परिसर के भीतर आम नागरिकों और श्रद्धालुओं के रोजाना ठगे जाने, पीटे जाने और अपारदर्शी समूहों द्वारा उपद्रव मचाए जाने के बावजूद सदस्य सचिव श्रेष्ठ ने लाचार चुप्पी साध रखी है। संध्या आरती (बुढासुब्बा) के साथ समझौते को रद्द करने और विवाद के बारे में पूछने पर श्रेष्ठ ने कहा, "संध्या आरती के बारे में हम अदालत में जवाब देंगे, यह मामला अदालत में जा चुका है।" इसी प्रकार वर्षों से बिना किराए और बिना अनुमति के संचालित गंगा आरती के बारे में पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा, "गंगा आरती समूह है ऐसा एक समूह कहता है— उसके बारे में मुझे नहीं पता, सूचना अधिकारी से पूछिए। हमारे आने से पहले क्या-क्या हुआ पता नहीं, मैंने भी विस्तार से नहीं समझा है। उन्होंने अनुमति ली है या नहीं, यह विषय जांच के बाद ही पता चलेगा।" मंदिर के प्रशासनिक प्रमुख होने के बावजूद परिसर के भीतर हो रहे अवैध धंधों के बारे में "पता नहीं" कहकर पल्ला झाड़ना उनकी भूमिका पर गंभीर संदेह पैदा करता है।
४. राजन गुरुङ 'भाले डन' (संचालक, भालेश्वर प्रा.लि.):
कास्की के राजन गुरुङ ने फोटोग्राफी के समझौते की आड़ में पशुपतिनाथ मंदिर परिसर में कैमरामैनों के नाम पर दर्जनों गुंडे पालकर 'भाले तंत्र' चला रखा है। तय किराया न चुकाने, श्रद्धालुओं से मनमाना शुल्क वसूलने और विरोध करने वाले भक्तों के साथ मारपीट करने के कृत्यों में गुरुङ का समूह संलिप्त रहा है। कोष के साथ अनुबंध साउन मसान्त २०८३ को समाप्त हो चुका है, इसके बावजूद गुरुङ के कैमरामैन और बिचौलिया अब भी मंदिर परिसर में अनाधिकृत रूप से घूमते रहते हैं और अन्य निकायों को काम न करने की धमकी देते रहते हैं। अनुबंध रद्द होने के बाद भी कायम उनकी अवांछित उपस्थिति और वसूली के धंधे पर प्रतिक्रिया के लिए संपर्क करने पर राजन गुरुङ का फोन स्विच ऑफ था।
उच्च न्यायालय में विचाराधीन कानूनी प्रक्रिया
कोष द्वारा १५ बैशाख के निर्णय को आधार बनाते हुए १८ भदौ को बुढासुब्बा डिजिटल प्रा.लि. के साथ समझौता एकतरफा रूप से रद्द करने के बाद यह विवाद अब कानूनी घेरे में पहुँच गया है। करोड़ों रुपये की जमानत राशि और बैंक गारंटी जमा करने के बाद भी कार्य आदेश न मिलने और अन्यायपूर्ण तरीके से खदेड़े जाने का आरोप लगाते हुए बुढासुब्बा के प्रबंधक नवराज गिरी कानूनी उपचार के लिए पाटन उच्च न्यायालय पहुँच गए हैं। अदालत में मामला विचाराधीन होने के बावजूद कोष के अधिकारी अदालत की आड़ लेकर अपनी अनियमितताओं को छुपाने का प्रयास कर रहे हैं।
आर्यघाट पर आरती की धार्मिक तथा शास्त्रीय औचित्यहीनता
पशुपतिनाथ मंदिर की भौगोलिक स्थिति और शास्त्रीय मान्यताओं को देखने पर धार्मिक विद्वानों का निष्कर्ष है कि वर्तमान में बागमती के पार से संचालित हो रही गंगा आरती की दिशा और स्थान सर्वथा अनुपयुक्त है।
- भौगोलिक एवं वास्तुगत असामंजस्यता: पशुपतिनाथ का मुख्य मंदिर बागमती नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है। शास्त्रीय विधान के अनुसार किसी भी पूजा या आरती को भगवान की तरफ मुख करके या पूर्व की ओर मुंह (पूर्वमुख) करके किया जाना चाहिए। लेकिन बागमती के पार (पूर्वी तट) से की जाने वाली गंगा आरती पश्चिम की ओर मुंह करके की जाती है, जिसके कारण आरती करते समय भगवान पशुपतिनाथ की तरफ पीठ हो जाती है।
- दाह संस्कार और आरती का द्वंद्व: बागमती के पार से पश्चिम की ओर मुंह करके आरती करने पर ठीक सामने आर्यघाट और भष्मेश्वर घाट पड़ते हैं। एक तरफ चिता में शव जलने का शोककुल वातावरण और दूसरी तरफ उसी को पृष्ठभूमि बनाकर बाजे-गाजे के साथ संगीतिक आरती का आयोजन किया जाना हिंदू संस्कारों और दाह संस्कार की गंभीर मर्यादा के विपरीत है। शवदाह (मृत्यु के कर्म) और आरती (जीवन और उल्लास की पूजा) को एक साथ मिलाकर व्यावसायिक रूप से प्रदर्शित किए जाने से मंदिर की मूल आध्यात्मिक चेतना को गंभीर आघात पहुँचा है।
अनुबंध रद्द होने के बाद भी कायम अवांछित दबाव
कोष द्वारा कागजों में अनुबंध रद्द करने की घोषणा किए जाने के बावजूद व्यवहार में भालेश्वर प्रा.लि. और राजन गुरुङ के अनाधिकृत कैमरामैन मंदिर परिसर से नहीं हटे हैं। अनुबंध की अवधि समाप्त होने के बाद भी 'भाले डन' के लोग मंदिर के संवेदनशील स्थलों पर तैनात रहकर श्रद्धालुओं को घेरने, भारी शुल्क मांगने और विरोध करने पर अभद्र व्यवहार करने के कृत्यों में संलिप्त हैं। कुछ महीने पहले पशुपति परिसर में ही भारतीय सेना के एक जवान पर हुआ जानलेवा हमला यहाँ की सुरक्षा व्यवस्था कितनी कमजोर है, इसे पूरी तरह उजागर कर चुका है।
राज्य के विनियामक निकायों, अख्तियार दुरुपयोग अनुसंधान आयोग और गृह प्रशासन को तत्काल कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है ताकि दुनिया भर के अरबों हिंदुओं की आस्था के केंद्र पशुपतिनाथ को गुंडागर्दी, हफ्ता वसूली और प्रशासनिक भ्रष्टाचार का अड्डा बनने से रोका जा सके।